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अजब जनपद: उपयंत्री बोले- ‘हरि’ से पूछकर बताऊंगा, जबकि विभाग में इस नाम का कोई पदस्थ ही नहीं

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खबरवाणी

अजब जनपद: उपयंत्री बोले- ‘हरि’ से पूछकर बताऊंगा, जबकि विभाग में इस नाम का कोई पदस्थ ही नहीं

आमला। अंबाड़ा में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े लाखों के चेकडैम; पहली बारिश में बही साइड वॉल, मुख्य दीवार छलनी

आमला। जनपद पंचायत आमला के तहत आने वाली ग्राम पंचायत अंबाड़ा इन दिनों विकास कार्यों के बजाय भ्रष्टाचार और ‘अदृश्य’ सिस्टम को लेकर चर्चा में है। यहाँ लाखों की लागत से बने चेकडैम किसानों को पानी देने के बजाय सरकारी राशि को बहाने का जरिया बन गए हैं। ताज्जुब की बात यह है कि जब निर्माण कार्यों की तकनीकी खामियों पर जिम्मेदार उपयंत्री (सब-इंजीनियर) से सवाल किया जाता है, तो वे सीधे जवाब देने के बजाय एक तथाकथित ‘हरि’ नाम के व्यक्ति से सलाह लेने की बात कहते हैं। सवाल यह उठता है कि जब जनपद या आरईएस विभाग में इस नाम का कोई अधिकारी या कर्मचारी पदस्थ ही नहीं है, तो फिर यह ‘हरि’ कौन है जो सरकारी फाइलों और निर्माणों पर पर्दे के पीछे से प्रभाव डाल रहा है?

2 साल में दो चेक के लिए के लिए स्वीकृति 14 लाख

पंचायत ने पिछले दो वर्षों में सिंचाई सुविधा के नाम पर दो अलग-अलग मदों से चेकडैम का निर्माण कराया।
वर्ष 2024: 15वें वित्त आयोग से 6.19 लाख की लागत से यशवंत के खेत के पास डैम बना।
वर्ष 2025: खनिज मद से 7.94 लाख की लागत से श्मशान घाट के पास नया चेकडैम खड़ा किया गया।
धरातल पर स्थिति यह है कि कुल 14.13 लाख रुपए खर्च होने के बाद भी एक प्रतिशत पानी का ठहराव नहीं हो पा रहा
है।

रेत की जगह डस्ट का खेल, वाइब्रेटर तक नहीं चलाया

ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण के दौरान तकनीकी मापदंडों की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं। एस्टीमेट के विपरीत लागत कम करने के चक्कर में सीमेंट के साथ रेत की जगह स्टोन क्रेशर की डस्ट (धूल) मिलाई गई। कंक्रीट को मजबूती देने के लिए वाइब्रेटर मशीन का उपयोग तक नहीं किया गया, जिससे दीवारें अंदर से खोखली रह गईं। यही कारण है कि पहली ही बारिश में नए चेकडैम की साइड वॉल ताश के पत्तों की तरह बह गई।

सूख गए किसानों के अरमान, छलनी हो गई दीवारें

ग्रामीणों को उम्मीद थी कि इन चेकडैमों से रबी की फसलों को जीवनदान मिलेगा, लेकिन घटिया निर्माण के कारण मुख्य दीवार (मेन वॉल) में इतने अधिक लीकेज हैं कि बारिश रुकते ही डैम पूरी तरह सूख जाता है। वर्तमान में यह संरचनाएं केवल कंक्रीट के ढांचे बनकर खड़ी हैं, जिनसे किसानों को फूटी कौड़ी का लाभ नहीं मिल रहा है।

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