Monday, July 4, 2022
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HomeबैतूलPolitics : 'बैतूल जिला' और उसके सियासी बदलाव के मायने 

Politics : ‘बैतूल जिला’ और उसके सियासी बदलाव के मायने 

बाहरी नेताओं ने भी किया जिले पर 33 वर्षों तक राज

बैतूल – 1952 में पहले लोकसभा चुनाव और 1956 में मध्यप्रदेश राज्य के गठन के बाद बैतूल जिले की दलीय राजनीति में कई उतार चढ़ाव आए है। जिले की जनता ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को जनप्रतिनिधि बनते देखा है तो कई प्रसिद्ध अधिवक्ताओं, उद्योगपतियों, किसानों, चिकित्सकों, छात्र नेताओं को भी जनप्रतिनिधि बनने का मौका मिला है। कई परिवार में तो दादा, पुत्र, पौत्र को तो कहीं पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-भाई और चाचा-भतीजों को भी कांग्रेस और भाजपा ने समय समय पर चुनाव मैदान में उतारा है।

33 वर्षों तक बाहरी नेताओं ने किया बैतूल पर राज

जिले के राजनैतिक क्षितिज पर कई नेता लंबे समय तक दैदीप्यमान होते रहे तो कुछ का संक्षिप्त काल रहा, लेकिन सबका अपना-अपना दौर था। इनमें भी खासियत यह रही कि जिनका बैतूल से दूर-दूर तक नाता नहीं था, वो भी लंबे समय तक जिले पर राज करते रहे। इनमें कांग्रेस के भीकुलाल चांडक (नागपुर), नरेन्द्र कुमार सालवे (नागपुर), गुफराने आजम (भोपाल), असलम शेर खान (भोपाल) और भाजपा के आरिफ बेग (भोपाल) 33 वर्षों तक बैतूल के सांसद रहे। फिर इस सीट पर स्थानीय नेताओं में सबसे ज्यादा चार बार चुनाव जीतकर भाजपा नेता विजय खंडेलवाल 11 वर्ष तक सांसद रहे तो दो बार चुनाव जीतकर भाजपा की ही ज्योति धुर्वे 10 वर्ष तक सांसद रही। एक बार 3 वर्ष तक सुभाष आहूजा भी सांसद रहे वर्तमान में भाजपा के डीडी उइके सांसद है।

डॉक्टर वकील भी बने जनप्रतिनिधि

जिले की राजनीति में कई दिग्गज वकील भी आगे आए, इनमें आरडी खंडेलवाल, बल्ला भाऊ, राधाकृष्ण गर्ग, जीडी खंडेलवाल, विजय खंडेलवाल, पृथ्वीनाथ भार्गव, गुरुबक्श अतुलकर, पंजाबराव महस्की, रामचरित मिश्रा, राजीव खंडेलवाल, रवि यादव, कल्लू सिंह ठाकुर, मधुकर महस्की प्रमुख है। इनमें कई सफल हुए तो कई असफल। इसी तरह से जिले के कई डॉक्टर्स भी राजनीति में आगे आए। इनमें डॉ. मारोतीराव पांसे, डॉ. अशोक साबले, डॉ. मोहन बाबरू, डॉ. एमआर पांसे, डॉ. पीआर बोडखे, डॉ. जीए बारस्कर, डॉ. राजेन्द्र देशमुख और वर्तमान में डॉ. योगेश पंडाग्रे बड़ा नाम है। राजनीति की पाठशाला साबित हुई नपा नगरपालिका से राजनीति शुरू करने वाले जिले के कई नेता सांसद-विधायक भी बने। इनमें आरडी खंडेलवाल, हरकचंद डागा, राधाकृष्ण गर्ग, विजय खंडेलवाल, शिवप्रसाद राठौर, अलकेश आर्य, जीए बारस्कर मुलताई प्रमुख है।

परिवार के सदस्यों को मिला मौका

दो परिवारों की तीन पीढ़ी को जिले में उनके राजनैतिक दल ने कई अवसर दिए। इनमें कांग्रेस ने बैतूल विधानसभा से दादा हरकचंद डागा, पुत्र विनोद डागा एवं पौत्र निलय डागा को चुनाव में उतारा तो भैंसदेही में भाजपा (पूर्व जनसंघ) ने दादा दद्दू सिंह, पुत्र केसर सिंह और पौत्र महेन्द्र सिंह चौहान को 11 बार मौका दिया। जिले में पिता-पुत्र की जोड़ी में मोहकम सिंह- प्रताप सिंह, विजय खंडेलवाल हेमंत खंडेलवाल, हरकचंद डागा-विनोद डागा, केसर सिंह- महेन्द्र सिंह, विनोद डागा निलय डागा को चुनाव लड़वाया। पति-पत्नी की जोड़ी में बिहारीलाल पटेल- लक्ष्मी बाई पटेल और रामजीलाल-गीता उइके को विधानसभा चुनाव लडने का मौका मिला। चाचा-भतीजों में बुधराव देशमुख- चंद्रशेख देशमुख, बालकृष्ण पटेल-सुरेन्द्र पटेल, एमएन पांसे-सुखदेव पांसे, जीडी खंडेलवाल विजय खंडेलवाल को कांग्रेस-भाजपा ने चुनाव मैदान में उतारा।

70 साल में कांग्रेस नहीं बना पाई स्थानीय सांसद

1952 से आज तक 70 साल में बैतूल जिले के संसदीय इतिहास में कांग्रेस का कोई भी स्थानीय नेता बैतूल जिले का सांसद नहीं बन पाया है, जबकि कांग्रेस के ही बाहरी नेता 1952 से 1972 तक, 1980 से 1989 तक तथा 1991 से 1996 तक यानी 33 वर्षों तक बैतूल के सांसद रहे। ये भी रहे जिले में जनप्रतिनिधि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दीपचंद गोठी, आनंदराव लोखंडे, मारूतिलाल, रामजी महाजन, माधव गोपाल नासेरी, भगवत सिंह पटेल, मनीराम बारंगे, वासुदेव ठाकरे, सुनीलम, अशोक कड़वे के नाम शामिल है। आरक्षण का इन्हें भी मिला लाभ जिले की आरक्षित सीटों पर लड़ने और जीतने वाले इन नेताओं में माडूसिंह, सोमंदत्त, जंगू सिंह, सज्जन सिंह, हीरालाल चंदेलकर, सतीश चौहान, गंजन सिंह कुमरे, काल्या सिंह चौहान, कन्हैयालाल ढ़ोलेकर, सुनीता बेले, मीरा धुर्वे, विश्राम सिंह मवासे, पतिराम सांडिल्य, धरमू सिंह, ब्रह्मा भलावी भी शामिल है।

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