खबरवाणी
व्यक्ति कितना भी धन अर्जित कर ले, उसे कम ही लगता है, यही लोभ है और यही आगे चलकर विनाश का कारण बनता है
– मुनिश्री कुंथुसागर जी महाराज
दशलक्षण महापर्व में शौच धर्म का महत्व बताया, विश्व शांति के लिए हुई शांतिधारा
बुरहानपुर नि.प्र. – श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, इंदिरा कॉलोनी में प. पू. मुनिश्री 108 कुंथुसागर जी महाराज के पावन सानिध्य में चल रहे दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत शौच धर्म का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित धार्मिक अनुष्ठानों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। प्रवचन में मुनिश्री कुंथुसागर जी महाराज ने कहा कि सुचिता का भाव ही शौच धर्म है और लोभ की निवृत्ति ही शौच धर्म का सार है। मनुष्य के मन में लोभ भरा रहता है। दशलक्षण जैसे धार्मिक पर्व और अनुष्ठानों का उद्देश्य बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि मन एवं आत्मा को शुद्ध करना है। पवित्रता का सबसे बड़ा विरोधी लोभ है। जब तक मन में लोभ रहेगा, तब तक आत्मा की वास्तविक पवित्रता संभव नहीं है।
व्यक्ति कितना भी धन अर्जित कर ले, उसे कम ही लगता है, यही लोभ है और यही आगे चलकर विनाश का कारण बनता है। जीवन को श्रेष्ठ बनाना है तो दान-पुण्य, धार्मिक अनुष्ठान और सद्कार्यों को जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। लोभ मनुष्य को पाप की ओर ले जाता है, इसलिए सांसारिक आसक्ति और लालच को छोड़कर मन को निर्मल बनाने का प्रयास करना चाहिए। प्रमोद जैन बड़जात्या एवं महेंद्र जैन लुहाड़िया ने बताया कि दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत आयोजित शिविर में प्रथम अभिषेक करने का सौभाग्य प्रेमचंद सिंघई, सागरमल सुभाष सेठी तथा राजेंद्र, नीरज लुहाड़िया परिवार को प्राप्त हुआ। समाजजनों ने सभी अभिषेककर्ताओं को बधाई देते हुए उनकी अनुमोदना की। शौच धर्म के पावन अवसर पर विश्व शांति की कामना को लेकर मुनिश्री के सानिध्य में श्रद्धालुओं द्वारा शांतिधारा की गई। शांतिधारा करने का सौभाग्य अंकित ठोलिया, शीतल कुमार जैन, देवेंद्र कुमार जैन, गौरव कासलीवाल, अभिषेक गंगवाल, संदेश सुरेंद्र जैन, अनंत गंगवाल, दीपेश जैन एवं प्रसन्न जैन को प्राप्त हुआ।
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