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सरकारी दावों की खुली पोल: बांटी गई ‘खटारा’ साइकिलें, छात्राओं को घंटों करना पड़ा पैदल सफर।
आमला सरकार की महत्वाकांक्षी नि:शुल्क साइकिल वितरण योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को शिक्षा से जोड़ना था, लेकिन आमला के शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल छवाल में यह योजना अपनी शुरुआत के पहले ही दिन हंसी का पात्र बन गई। जैसे ही छात्राओं को साइकिलें मिलीं, कुछ ही मिनटों में उनकी खुशी मायूसी में बदल गई।
क्या है पूरा मामला?
छात्राओं ने बताया कि वितरण के तुरंत बाद ही साइकिलें जवाब दे गईं। किसी साइकिल की चेन उतर गई, तो किसी का पैडल जाम हो गया, और कई साइकिलों के टायरों में हवा तक नहीं थी। इस कारण छात्राओं को स्कूल से घर तक 2 से 3 किलोमीटर का रास्ता साइकिलें पैदल घसीटकर तय करना पड़ा।
अधिकारियों और प्रशासन पर उठे सवाल।
प्राचार्य का बयान: स्कूल की प्राचार्य किरण खोबरे का कहना है कि विभाग से जैसी साइकिलें प्राप्त हुई थीं, वैसी ही विद्यार्थियों को बांट दी गईं।
बीईओ का पक्ष: विकासखंड शिक्षा अधिकारी धीरेन्द्र साहू के अनुसार, उन्हें अभी तक कोई शिकायत नहीं मिली है, लेकिन खराबी होने पर संबंधित संस्था से संपर्क कर समाधान कराया जाएगा।
कांग्रेस ने साधा निशाना:
कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष विजेंद्र भावसार ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे भ्रष्टाचार का मामला बताया है। उन्होंने कहा कि सरकार को साइकिल देने के बजाय विद्यार्थियों के खाते में राशि डालनी चाहिए थी ताकि वे अच्छी गुणवत्ता की साइकिल ले सकें।
वितरण से पहले जांच क्यों नहीं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि साइकिलें स्कूलों तक पहुँचने से पहले उनकी गुणवत्ता और फिटनेस की जांच क्यों नहीं की गई? क्या अब दोषी एजेंसी पर कोई कार्रवाई होगी, या छात्राओं की इस परेशानी को यूँ ही नज़रअं
दाज़ कर दिया जाएगा?




