
जिले की सभी सीटों पर एक साथ नहीं हुआ कांग्रेस का कब्जा
Politics – बैतूल – 1952 में मध्यप्रदेश के गठन के पहले एवं 1956 में मध्यप्रदेश के गठन के बाद से आज तक प्रदेश में प्रमुख राजनैतिक दलों में जनसंघ (बाद में जनता पार्टी, अब भाजपा) और कांग्रेस में ही चुनावी राजनैतिक प्रतिद्वंदिता बनी हुई है। और यही स्थिति बैतूल जिले की भी है। यहां भी कांग्रेस और भाजपा दोनों का ही अस्तित्व है।
तीसरा मोर्चा या अन्य किसी दल को छुटपुट सफलता प्राप्त हुई है। लेकिन पिछले 60 साल में अन्य किसी राजनैतिक दल को अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर विधायक निर्वाचित करने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ है। लेकिन इन सभी चुनाव में यह देखने में आया है कि किसी विधानसभा चुनाव के दौरान जिले की सभी सीटों पर एकसाथ किसी को सफलता प्राप्त हुई है तो वह भाजपा है। कांग्रेस के खाते मेंं यह उपलब्धि दर्ज नहीं है। इस तरह से 70 साल के चुनावी इतिहास में भाजपा ने दो बार सभी सीटें जीतने का रिकार्ड अपने नाम दर्ज किया है।
1990 में सभी 6 सीटें जीती भाजपा | Politics
विधानसभा चुनाव में 1990 में पहली बार ऐसी स्थिति बनी कि जिले की सभी 6 विधानसभा सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार के सफल हुए जिनमें बैतूल से भगवत पटेल, भैंसदेही से केसर सिंह चौहान, मासोद से वासुदेव ठाकरे, मुलताई से मनीराम बारंगे, घोड़ाडोंगरी से रामजीलाल उइके और आमला से कन्हैयालाल ढोलेकर शामिल है।
इन सभी 6 उम्मीदवारों के निकटतम प्रतिद्वंदी कांग्रेस उम्मीदवार रहे। जिनमें बैतूल से डॉ. अशोक साबले, भैंसदेही से गंजनसिंह कुमरे, मासोद से रामजी महाजन, मुलताई से धनराज कड़वे, घोड़ाडोंंगरी हर्षलता सिबलुन और आमला से सुंदरलाल वाईकर चुनाव हारे थे।
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2013 में फिर जीते सभी भाजपाई
परीसीमन के बाद 2008 में जिले में 5 विधानसभा सीट रह गई थी। 2013 में जिले में विधानसभा चुनाव में जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर एक बार फिर भाजपा उम्मीदवारों को जीतने का अवसर मिला। इनमें बैतूल से हेमंत खण्डेलवाल, मुलताई से चंद्रशेखर देशमुख, घोड़ाडोंगरी से सज्जन सिंह उइके, आमला से चैतराम मानेकर और भैंसदेही से महेंद्र सिंह चौहान शामिल है। वहीं कांग्रेस के हारने वाले पांच उम्मीदवारों में बैतूल से हेमंत वागद्रे, मुलताई से सुखदेव पांसे, घोड़ाडोंगरी से ब्रम्हा भलावी, आमला से सुनीता बेले एवं भैंसदेही से धरमूसिंह शामिल है।
1993 में कांग्रेस एक सीट से नहीं बनाई पाई रिकार्ड | Politics
1993 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के 6 उम्मीदवार चुनाव हार गए थे लेकिन कांग्रेस को 6 सीटों पर एक साथ सफलता नहीं मिली। मुलताई से निर्दलीय डॉ. पीआर बोडख़े ने इस चुनाव में भाजपा के मनीराम बारंगे को हराया था। तब कांग्रेस के प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे थे। लेकिन कांग्रेस के बैतूल से डॉ. अशोक साबले, घोड़ाडोंगरी से प्रताप सिंह, आमला से गुरुबक्श अतुलकर, भैंसदेही से गंजनसिंह कुमरे एवं मासोद से रामजी महाजन चुनाव जीते थे। इस चुनाव में भाजपा की टिकट पर हारने वालों में बैतूल से भगवत पटेल, घोड़ाडोंगरी से रामजीलाल उइके, आमला से अशोक नागले, भैंसदेही से केसर सिंह और मासोद से ओमकार बर्डे शामिल है।
1972 में भी ऐसी ही बनी थी स्थिति
1972 के विधानसभा चुनाव में भी विपक्षी दल जनसंघ के पांचों उम्मीदवार चुनाव हारे थे। लेकिन कांग्रेस को तीन सीटों पर विजय प्राप्त हुई और 2 सीट निर्दलियों के खाते में गई थी। कांग्रेस से जीतने वालों मे ंबैतूल से मारोतीराव पांसे, भैंसदेही से काल्यासिंह चौहान एवं घोड़ाडोंगरी विश्राम सिंह मवासे शामिल है। वहीं निर्दलीय सफल उम्मीदवारों में मुलताई से राधाकृष्ण गर्ग एवं मासोद से रामजी महाजन थे। इस चुनाव में जनसंघ से हारे वाले पांचों उम्मीदवारों में बैतूल से जीडी खण्डेलवाल, मुलताई से पृथ्वीनाथ भार्गव, मासोद से बुधराव पांडू, भैंसदेही से केसर सिंह और घोड़ाडोंगरी से जंगू सिंह शामिल है।
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