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पांच दिन बाद भी कार्रवाई नहीं, सिर्फ नोटिसबाजी में उलझा स्वास्थ्य विभाग

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खबरवाणी

पांच दिन बाद भी कार्रवाई नहीं, सिर्फ नोटिसबाजी में उलझा स्वास्थ्य विभाग

कथित झोलाछाप इलाज मामले में बीएमओ ने थमाया लेटर , लेकिन न सीलिंग हुई, न एफआईआर

भौंरा । ग्राम बरजोरपुर स्थित महावीर मेडिकल स्टोर पर कथित एलोपैथिक इलाज के मामले में पांचवें दिन स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई केवल नोटिस और पत्राचार तक सिमटती दिखाई दे रही है। अब तक न तो मेडिकल स्टोर पर कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई हुई और न ही किसी प्रकार की कानूनी प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी सामने आई। पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग पर कार्रवाई के बजाय लेटर-लेटर खेल खेलने के आरोप लगने लगे हैं। अब सामने आए बीएमओ कार्यालय शाहपुर के पत्र ने विभागीय कार्रवाई की वास्तविक स्थिति भी उजागर कर दी है। 25 मई को जारी पत्र में मुख्य खंड चिकित्सा अधिकारी शाहपुर द्वारा महावीर मेडिकल स्टोर संचालक को निर्देशित किया गया है कि समाचार पत्रों के माध्यम से बिना वैध डिग्री मेडिकल संचालन एवं मरीजों के उपचार की जानकारी प्राप्त हुई है। पत्र में संचालक से तीन दिवस के भीतर मेडिकल स्टोर संचालन और उपचार से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा गया है। साथ ही दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करने पर एफआईआर दर्ज कराने की चेतावनी दी गई है। लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि जब स्वास्थ्य विभाग स्वयं पत्र में यह स्वीकार कर रहा है कि बिना वैध डिग्री इलाज किए जाने की सूचना मिली थी, तो फिर मौके पर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

कार्रवाई के बजाय सिर्फ कागजी प्रक्रिया?

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि मामला इतना गंभीर था कि एफआईआर तक की चेतावनी देनी पड़ी, तो फिर मेडिकल परिसर को सील क्यों नहीं किया गया? दस्तावेज जब्त क्यों नहीं किए गए? और आखिर पांच दिन बाद भी विभाग केवल पत्राचार में ही क्यों उलझा हुआ है?
ग्रामीणों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग पूरे मामले में सख्ती दिखाने के बजाय समय देने और प्रक्रिया लंबी खींचने में लगा हुआ है। लोगों का कहना है कि यदि किसी आम व्यक्ति पर इतना गंभीर आरोप होता तो तत्काल पुलिस कार्रवाई होती, लेकिन यहां विभाग केवल नोटिस देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मानता दिखाई दे रहा है।

तीन दिन में दस्तावेज लाओ, तब तक इलाज चलता रहे?

क्षेत्रवासियों ने सवाल उठाया कि यदि किसी मेडिकल संचालक पर बिना वैध योग्यता इलाज करने का संदेह है, तो क्या उसे तीन दिन का समय देकर गतिविधियां जारी रखने देना उचित है? लोगों का कहना है कि इस प्रकार की कार्यप्रणाली से कार्रवाई की गंभीरता पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार आदिवासी क्षेत्रों में वर्षों से मेडिकल दुकानों की आड़ में कथित इलाज का नेटवर्क चलता रहा, लेकिन स्वास्थ्य विभाग और औषधि प्रशासन केवल औपचारिक निरीक्षण तक सीमित रहे। अब मामला सार्वजनिक होने के बाद भी सख्त कार्रवाई के बजाय दस्तावेज प्रस्तुत करें जैसे पत्र जारी कर खानापूर्ति की जा रही है।

ड्रग इंस्पेक्टर और औषधि विभाग भी सवालों में

मामले में औषधि प्रशासन विभाग की भूमिका पर भी सवाल लगातार गहराते जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि मेडिकल स्टोरों के लाइसेंस और गतिविधियों की निगरानी ड्रग इंस्पेक्टर की जिम्मेदारी होती है, लेकिन क्षेत्र में नियमित निरीक्षण शायद ही कभी दिखाई देते हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि साल में एक-दो बार औपचारिक निरीक्षण कर विभाग अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है, जिसके कारण मेडिकल दुकानों पर क्या गतिविधियां चल रही हैं, इसकी जमीनी निगरानी नहीं हो पाती।

सूचना मिली तो पहले क्या कर रहा था विभाग?

पत्र में यह उल्लेख होना कि विभाग को समाचार पत्रों के माध्यम से जानकारी मिली, अब खुद विभागीय निगरानी पर बड़ा सवाल बन गया है। लोगों का कहना है कि यदि समाचार प्रकाशित होने के बाद विभाग जागा, तो इससे पहले वर्षों तक जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे थे?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि आदिवासी अंचलों में स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरी का फायदा उठाकर कथित अवैध क्लीनिक खुलेआम संचालित होते रहे और विभागीय सिस्टम सिर्फ कागजों में जांच करता रहा। अब भी यदि कार्रवाई केवल नोटिस और फाइलों तक सीमित रही, तो यह पूरे सिस्टम की गंभीर विफलता मानी जाएगी।

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