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ताप्ती नदी में मिल रहा नालों का गंदा पानी, आस्था और पर्यावरण दोनों पर संकट
बुरहानपुर।
शहर की जीवनरेखा कही जाने वाली ताप्ती नदी आज गंभीर प्रदूषण की मार झेल रही है। शहर के कई हिस्सों से निकलने वाले नालों का गंदा पानी सीधे ताप्ती नदी में मिल रहा है, जिससे न केवल नदी का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ता जा रहा है, बल्कि हिंदू धर्म की आस्था को भी ठेस पहुंच रही है।
ताप्ती नदी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बुरहानपुर में विशेष स्थान रखता है। प्रतिदिन सुबह और शाम के समय बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता-पिता नदी तट पर स्नान, पूजा-पाठ, दीपदान एवं जल अर्पण के लिए पहुंचते हैं। लेकिन वर्तमान हालात यह हैं कि नदी के घाटों से दुर्गंध उठ रही है, पानी का रंग बदला हुआ दिखाई देता है और जगह-जगह गंदगी तैरती नजर आती है।
घाट बने धोबी घाट, खुलेआम धुल रहे कपड़े
ताप्ती नदी के कई घाट अब धार्मिक स्थल से अधिक धोबी घाट में तब्दील होते जा रहे हैं। नदी किनारे लोग घरों की गंदगी, कपड़े, और अन्य सामान खुलेआम धोते नजर आते हैं। साबुन और डिटर्जेंट का झाग सीधे नदी में मिल रहा है, जिससे जल प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है।
श्रद्धालुओं का कहना है कि जिस नदी को वे पवित्र मानते हैं, उसी नदी में गंदगी और नालों का पानी मिलते देख मन को गहरी पीड़ा होती है। पूजा-पाठ के दौरान दुर्गंध और गंदे पानी के कारण श्रद्धालुओं को असहज स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।
नालों का पानी बना सबसे बड़ी समस्या
शहर के कई बड़े-छोटे नाले बिना किसी शुद्धिकरण के सीधे ताप्ती नदी में छोड़े जा रहे हैं। जब नालों का बहाव तेज होने से सारा कचरा, प्लास्टिक और गंदगी नदी में समा जाती है।
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि इससे नदी का जल स्तर तो प्रभावित हो ही रहा है, साथ ही जलीय जीवों के अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा रहा है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले समय में ताप्ती नदी का जल पूरी तरह अनुपयोगी हो सकता है।
सरकारी योजनाओं का जमीन पर असर नहीं
स्वच्छ भारत अभियान, नदी संरक्षण योजना और नाला ट्रीटमेंट जैसी कई सरकारी योजनाएं कागजों में तो चल रही हैं, लेकिन उनका प्रभाव धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा है। नालों के पानी को शुद्ध करने के लिए बनाए गए प्लांट या तो पूरी तरह चालू नहीं हैं या फिर क्षमता से कम काम कर रहे हैं।
नदी संरक्षण के नाम पर सिर्फ बैठकों और योजनाओं तक ही सीमित रह गया है, जबकि वास्तविकता में ताप्ती नदी दिन-प्रतिदिन और अधिक प्रदूषित होती जा रही है।
श्रद्धालुओं और नागरिकों में रोष
इस स्थिति को लेकर श्रद्धालुओं और सामाजिक संगठनों में भारी नाराजगी देखी जा रही है। लोगों का कहना है कि ताप्ती नदी सिर्फ एक जल स्रोत नहीं, बल्कि उनकी आस्था, संस्कृति और पहचान से जुड़ी हुई है। नदी की इस दुर्दशा से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंच रही है, जिसे किसी भी हाल में नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने संबंधित विभाग से मांग की है कि नालों के पानी को नदी में मिलने से पहले पूरी तरह शुद्ध किया जाए, घाटों पर गंदगी फैलाने वालों पर कार्रवाई हो और ताप्ती नदी के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो ताप्ती नदी का अस्तित्व और उसकी पवित्रता दोनों ही गंभीर संकट में पड़ सकती हैं।






