खबरवाणी
उप स्वास्थ्य केंद्र की फोटो पर विवाद गहराया, सीएचओ के ग्रुप संदेश से पत्रकारों में आक्रोश
संवाददाता प्रदीप यादव भीमपुर
कलेक्टर को बुलाने की बात पर भीमपुर इकाई के दर्जनों पत्रकारों ने जताई आपत्ति, कलेक्टर के नाम सौंपा ज्ञापन
पत्रकारों का सवाल—सिर्फ बंद उप स्वास्थ्य केंद्र की फोटो खींचना कौन-सी गलती? आपत्ति थी तो फोन कर स्पष्टीकरण दिया जा सकता था
भीमपुर। भीमपुर विकासखंड के पलस्या उप स्वास्थ्य केंद्र के बंद मिलने और उसकी फोटो पत्रकार द्वारा व्हाट्सएप ग्रुप में साझा किए जाने के बाद शुरू हुआ विवाद अब तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है। स्वास्थ्य विभाग की सीएचओ रानी तोमर द्वारा व्हाट्सएप ग्रुप में पत्रकार को दिए गए जवाब में बीएमओ के पास जाने, कलेक्टर को बुलाने तथा अधिकारियों के सामने पूरी बात रखने जैसे शब्दों के इस्तेमाल को लेकर भीमपुर क्षेत्र के पत्रकारों ने आपत्ति जताई है। मामले को लेकर आज भीमपुर इकाई के दर्जनों पत्रकारों ने एकजुट होकर जिला कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपते हुए पूरे घटनाक्रम की जांच और उचित कार्रवाई की मांग रखी।
पत्रकारों का कहना है कि किसी सरकारी उप स्वास्थ्य केंद्र के बंद मिलने पर उसकी फोटो लेकर वास्तविक स्थिति को सामने रखना पत्रकारिता का सामान्य दायित्व है। यदि स्वास्थ्य केंद्र बंद होने की फोटो को लेकर सीएचओ को किसी प्रकार की आपत्ति थी तो वह संबंधित पत्रकार को व्यक्तिगत रूप से फोन कर अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकती थीं। पत्रकारों के अनुसार, यदि यह बताया जाता कि कर्मचारी फील्ड में स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित कार्य में गया था या किसी अन्य कारण से केंद्र बंद था, तो मामले का स्पष्टीकरण वहीं हो सकता था।
लेकिन पत्रकारों का आरोप है कि व्यक्तिगत बातचीत के बजाय सैकड़ों लोगों वाले व्हाट्सएप ग्रुप में जिस तरह से तीखी प्रतिक्रिया दी गई और कलेक्टर तथा बीएमओ को बुलाने की बात कही गई, उससे अनावश्यक रूप से विवाद बढ़ गया।
‘कलेक्टर को बुलाने की बात करना कितना उचित?’
पत्रकारों ने सीएचओ के उस कथित संदेश पर विशेष आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने लिखा था कि “भीमपुर बीएमओ के पास चलना है या कलेक्टर सर के पास चलना है या उनको बुलाना है, मैं तैयार हूं।”
पत्रकारों का कहना है कि जिला कलेक्टर जिले के प्रशासनिक मुखिया होते हैं। ऐसे में एक सरकारी स्वास्थ्य कर्मचारी द्वारा किसी पत्रकार से सार्वजनिक व्हाट्सएप ग्रुप में इस तरह कलेक्टर को बुलाने अथवा उनके पास चलने की बात करना उचित व्यवहार है या नहीं, यह जांच का विषय है।
पत्रकारों ने यह भी सवाल उठाया कि आखिर पत्रकार ने ऐसी कौन-सी गलती की थी, जिसके कारण इतनी लंबी प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता पड़ी। पत्रकार ने केवल बंद पड़े उप स्वास्थ्य केंद्र की फोटो खींचकर ग्रुप में साझा की थी। यदि केंद्र वास्तव में किसी फील्ड गतिविधि के कारण बंद था तो इसका तथ्यात्मक जवाब देकर स्थिति स्पष्ट की जा सकती थी।
‘फोटो खींचना पत्रकार का अपराध नहीं’
पत्रकारों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल, पंचायत भवन और अन्य सार्वजनिक संस्थान सीधे आम जनता से जुड़े होते हैं। इन संस्थानों में समय पर सेवाएं मिल रही हैं या नहीं, कर्मचारी उपस्थित हैं या नहीं और जनता को किसी प्रकार की परेशानी तो नहीं हो रही है—इन मुद्दों को सामने लाना पत्रकारिता की जिम्मेदारी का हिस्सा है।
यदि किसी सरकारी संस्था के बंद होने की सूचना या फोटो सामने आती है तो उस पर संबंधित विभाग अपना पक्ष रख सकता है। पत्रकार द्वारा किसी सरकारी संस्था की फोटो लेना अपने आप में अपराध या अनुचित कार्य नहीं माना जा सकता, बशर्ते फोटो सार्वजनिक स्थान से सामान्य रिपोर्टिंग के दौरान ली गई हो और उसके साथ कोई भ्रामक दावा न किया गया हो।
पत्रकारों का कहना है कि यदि स्वास्थ्य विभाग के पास फोटो के संबंध में कोई अलग तथ्य है तो विभाग उसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे। इससे जनता के सामने वास्तविक स्थिति भी सामने आएगी और किसी कर्मचारी पर अनावश्यक आरोप भी नहीं लगेगा।
‘फील्ड में थीं तो फोन कर बताना पर्याप्त था’
मामले में सीएचओ की ओर से यह बात कही गई कि वह फील्ड में कार्यरत थीं तथा केंद्र खोलने में कुछ समय का अंतर रहा। इसी बात को लेकर पत्रकारों का कहना है कि यदि यही वास्तविक स्थिति थी तो संबंधित पत्रकार को फोन करके बताया जा सकता था कि “मैं फील्ड में हूं, थोड़ी देर से केंद्र पहुंची हूं, इसलिए केंद्र कुछ समय के लिए बंद था।”
पत्रकारों के अनुसार, इस तरह की सामान्य बातचीत से मामला समाप्त हो सकता था। लेकिन सार्वजनिक ग्रुप में व्यक्तिगत टिप्पणी और अधिकारियों को बुलाने की बात आने से विवाद अनावश्यक रूप से बढ़ गया।
नौ कर्मचारियों की मौजूदगी का भी दिया गया हवाला
सीएचओ ने अपने संदेश में यह भी कहा कि पलास्या हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर में वह अकेली कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि कुल नौ कर्मचारी कार्यरत हैं। उन्होंने ग्रुप में कर्मचारियों के नाम भी साझा किए।
बताई गई सूची में सीएचओ रानी तोमर, एएनएम अनीता उइके, एनओडब्ल्यू नंदकिशोर उइके, एमएसडब्ल्यू अक्षय धोते, आशा सहयोगी रंजना यादव, आशा कार्यकर्ता बाबिता यादव, मीरा जामुनकर, इमला बरासकर और चंद्रकला आखंडे के नाम शामिल हैं।
पत्रकारों का कहना है कि यदि केंद्र की व्यवस्था और कर्मचारियों की जिम्मेदारियों को लेकर कोई स्पष्टीकरण है तो विभागीय अधिकारी रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं। विवाद को व्यक्तिगत रूप देने के बजाय तथ्यों के आधार पर जवाब दिया जाना चाहिए।
पत्रकारों ने कलेक्टर, बीएमओ के नाम सौंपा ज्ञापन
मामले के बाद भीमपुर इकाई के दर्जनों पत्रकार एकजुट हुए और जिला कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपकर पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की मांग की। पत्रकारों ने कहा कि पत्रकारिता का उद्देश्य किसी कर्मचारी को व्यक्तिगत रूप से परेशान करना नहीं, बल्कि जनता से जुड़े मुद्दों को सामने लाना है।
ज्ञापन में पत्रकारों ने यह मुद्दा भी उठाया कि भविष्य में यदि किसी समाचार, फोटो या रिपोर्ट को लेकर किसी सरकारी कर्मचारी को आपत्ति हो तो वह संबंधित पत्रकार से सीधे संवाद कर अपना पक्ष रख सकता है। विभागीय अधिकारियों के समक्ष भी तथ्य रखे जा सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक मंच पर इस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए जिससे पत्रकार और विभाग के बीच अनावश्यक टकराव की स्थिति बने।
‘लापरवाही सामने लाना पत्रकार की जिम्मेदारी’
पत्रकारों ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में कई बार जनता को सरकारी संस्थानों की वास्तविक स्थिति की जानकारी मीडिया के माध्यम से ही मिलती है। यदि कोई उप स्वास्थ्य केंद्र बंद मिलता है, स्कूल में शिक्षक नहीं मिलता, सरकारी कार्यालय में कर्मचारी अनुपस्थित मिलता है या किसी योजना के क्रियान्वयन में समस्या दिखाई देती है, तो उसे सामने लाना पत्रकार की जिम्मेदारी है।
हालांकि, पत्रकारों ने यह भी कहा कि किसी भी खबर में तथ्य की पुष्टि और संबंधित पक्ष का पक्ष लेना आवश्यक है। यदि पलास्या उप स्वास्थ्य केंद्र बंद मिलने के पीछे फील्ड ड्यूटी या अन्य वैध कारण था तो स्वास्थ्य विभाग को उसका स्पष्ट तथ्य सामने रखना चाहिए।
अब जांच के बाद ही सामने आएगी वास्तविक स्थिति
फिलहाल विवाद के दोनों पक्षों की अपनी-अपनी बातें सामने आ रही हैं। एक ओर सीएचओ का कहना है कि वह फील्ड में कार्यरत थीं और केंद्र खोलने में कुछ समय का अंतर हुआ, वहीं पत्रकारों का कहना है कि उन्होंने केवल बंद उप स्वास्थ्य केंद्र की फोटो लेकर उसे सार्वजनिक किया था और इसके जवाब में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया, वह आपत्तिजनक है।
अब पूरे मामले में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि जिस समय फोटो ली गई, उस समय केंद्र क्यों बंद था, संबंधित कर्मचारी कहां थीं, क्या वह अधिकृत फील्ड ड्यूटी पर थीं, केंद्र के संचालन का निर्धारित समय क्या है और व्हाट्सएप ग्रुप में किए गए संदेशों की पूरी परिस्थितियां क्या थीं।
पत्रकारों द्वारा कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपे जाने के बाद अब निगाहें प्रशासन की जांच और संबंधित विभाग के जवाब पर टिकी हैं। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि केंद्र बंद होने की वास्तविक वजह क्या थी और सार्वजनिक ग्रुप में हुई बहस के लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर बनती है।





