Search ई-पेपर ई-पेपर WhatsApp

स्वास्थ्य विभाग के बाद अब औषधि प्रशासन भी सवालों में

By
On:

खबरवाणी

स्वास्थ्य विभाग के बाद अब औषधि प्रशासन भी सवालों में

मेडिकल दुकान पर कथित इलाज के आरोपों के बावजूद तीन दिन बाद भी कार्रवाई नहीं, लाइसेंस व्यवस्था और निगरानी पर उठे गंभीर प्रश्न

भौंरा । ग्राम बरजोरपुर स्थित महावीर मेडिकल स्टोर पर कथित रूप से एलोपैथिक इलाज किए जाने का मामला सामने आने के बाद अब स्वास्थ्य विभाग के साथ-साथ औषधि प्रशासन विभाग की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आ गई है। तीन दिन बीत जाने के बाद भी न तो मेडिकल स्टोर पर कोई दंडात्मक कार्रवाई हुई और न ही लाइसेंस संबंधी स्थिति स्पष्ट की गई। ऐसे में क्षेत्र में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर मेडिकल दुकानों की निगरानी करने वाला औषधि प्रशासन विभाग अब तक क्या कर रहा था।
जानकारों के अनुसार मेडिकल स्टोर का लाइसेंस औषधि प्रशासन विभाग द्वारा जारी किया जाता है। विभाग यह सुनिश्चित करता है कि मेडिकल स्टोर केवल निर्धारित नियमों के तहत दवा विक्रय का कार्य करें। मेडिकल दुकान का लाइसेंस मरीजों का इलाज करने, इंजेक्शन लगाने, ड्रिप चढ़ाने या क्लीनिक संचालन की अनुमति नहीं देता। यदि किसी मेडिकल स्टोर पर नियम विरुद्ध तरीके से उपचार किए जाने, इंजेक्शन लगाने या क्लीनिक जैसी गतिविधियां संचालित होने की शिकायत मिलती है तो औषधि प्रशासन विभाग को जांच करने, रिकॉर्ड खंगालने, दस्तावेजों की जांच करने और आवश्यक होने पर कार्रवाई करने का अधिकार होता है।

औषधि विभाग क्या कार्रवाई कर सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार यदि जांच में यह पाया जाता है कि मेडिकल स्टोर दवा विक्रय की आड़ में इलाज कर रहा था या लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन हुआ है, तो औषधि प्रशासन विभाग संबंधित मेडिकल स्टोर का लाइसेंस निलंबित या निरस्त कर सकता है। इसके अलावा विभाग संबंधित परिसर का निरीक्षण कर दवाओं का रिकॉर्ड, स्टॉक रजिस्टर, प्रिस्क्रिप्शन रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों की जांच कर सकता है। गंभीर स्थिति में प्रकरण दर्ज कराने के लिए स्वास्थ्य विभाग और पुलिस को भी पत्राचार किया जा सकता है।
जानकार बताते हैं कि यदि मेडिकल दुकान क्लीनिक की तरह संचालित होती पाई जाए तो यह लाइसेंस की मूल शर्तों का उल्लंघन माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में विभाग के पास सख्त कार्रवाई का अधिकार रहता है।

फिर तीन दिन तक कार्रवाई क्यों नहीं?

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि नियम इतने स्पष्ट हैं तो फिर मामले के सामने आने के बाद भी औषधि प्रशासन विभाग की ओर से कोई स्पष्ट कार्रवाई क्यों दिखाई नहीं दी। लोगों का आरोप है कि आदिवासी क्षेत्रों में मेडिकल दुकानों पर कथित इलाज कोई नई बात नहीं है, इसके बावजूद विभागीय निरीक्षण और निगरानी प्रभावी नहीं दिखती।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय-समय पर मेडिकल दुकानों की गंभीरता से जांच होती तो दवा विक्रय और उपचार के बीच की सीमाएं इस तरह धुंधली नहीं होतीं।

जांच से पहले मेडिकल बंद होने पर और गहरे हुए सवाल

मामले में स्वास्थ्य विभाग की जांच टीम के पहुंचने से पहले मेडिकल बंद मिलने के बाद अब औषधि प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि मामले की निष्पक्ष जांच करनी थी तो मेडिकल स्टोर के दस्तावेज, लाइसेंस शर्तें और दवा रिकॉर्ड की तत्काल जांच की जानी चाहिए थी। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कार्रवाई में देरी से पूरे मामले पर संदेह और बढ़ गया है। लोगों का कहना है कि यदि मेडिकल संचालक नियमों के तहत कार्य कर रहा था तो जांच के दौरान दुकान बंद कर गायब होने की जरूरत क्यों पड़ी।

संयुक्त कार्रवाई की मांग तेज

क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि स्वास्थ्य विभाग और औषधि प्रशासन संयुक्त रूप से पूरे मामले की विस्तृत जांच करें। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि संबंधित मेडिकल स्टोर को किन शर्तों पर लाइसेंस जारी किया गया था और क्या लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन हुआ है।
लोगों का कहना है कि यदि इस मामले में भी केवल औपचारिक जांच कर फाइल बंद कर दी गई तो आदिवासी क्षेत्रों में मेडिकल दुकानों की आड़ में कथित इलाज का नेटवर्क लगातार बढ़ता जाएगा।

For Feedback - feedback@example.com
Home Icon Home E-Paper Icon E-Paper Facebook Icon Facebook Google News Icon Google News