खबरवाणी
*महामण्डलेश्वर*
*स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरि की आमनागरिकों से अपील*
*पूजा-पाठ,तीज,त्यौहार,धार्मिक पर्व, अनुष्ठान, गणेशोत्सव, दुर्गोत्सव,महालक्ष्मी पूजन आदि में उपयोगी सामग्री(निर्माल्य) या पी.ओ.पी. की मूर्तियां (जहरीले कैमिकल युक्त)से रंगी मूर्तियों का विसर्जन सरोवरों,सरिताओं में नहीं करें*
उन का कहना है कि- प्राचीन समय में(आज से लगभग 60–65 वर्ष पूर्व तक सरितायें गहन-गम्भीर और तीव्रता पूर्वक सतत् प्रवहमान रहती थीं,इस कारण हमारे पूर्वज(बुजुर्ग) उपर्युक्त पूजावशेष(निर्माल्य) या माटी की मूर्ति विसर्जन नदियों में कर दिया करते थे किन्तु विगत पांच दशकों से हम आप देख रहे हैं और अनुभव कर रहे हैं कि- प्राकृतिक परिवर्तन सर्वत्र हुआ है,सरिताओं का जल स्तर घट रहा है, “वाटर लेबल” उथला हो गया है,सरिताओं का प्रवाह कम होता जा रहा है। माटी की प्रतिमाओं का स्थान कठोर पदार्थ पी.ओ.पी.ने ले लिया है, प्राकृतिक रंगों का स्थान जहरीले कैमिकल्स ने ले लिया है।छोटी प्रतिमाओं का स्थान विशालकाय प्रतिमाओं ने ले लिया है।इस तमाम कारणों से जलीय,थलीय और पर्यावरणीय प्रदूषण निरंतर बढ़ रहा है अतः युगानुकुल, समसामयिक, नवाचार करना समयोचित मांग या अनिवार्य आवश्यकता हो गई है अतः जल,जल और पर्यावरण की शुद्धि पूर्वक इन तत्त्वों के संरक्षण हेतु आमजनों को नवाचार के समक्ष नतमस्तक हो उसे स्वीकार करना ही होगा।अतः सृजन के साथ विसर्जन विधि की नवाचारित-युगानुकूल, समसामयिक स्वीकारोक्ति अनिवार्य हो। *पूजा-पाठ,तिथि-तीज, त्यौहारों का निर्माल्य विसर्जन घर पर ही तथा खेतों में बड़े-बड़े वृक्षों के नीचे या घरों में बड़े-बड़े टबोंको लाकर उनमें पानी भरकर मूर्ति विसर्जन करें।नदियां-सरितायें हमारी जीवन रेखा हैं उन्हें प्रदूषण मुक्त रखने के नूतन उपायों को मान्यता दें। भावनात्मक संरक्षण के साथ-साथ नवाचार की स्वीकारोक्ति शास्त्र सम्मत मान्य होगी,महालक्ष्मी पूजन में मिट्टी के बनायें गये हाथी(हथिया पूजन में उपयोग किये गये हाथी),हरतालिका पूजन के फुलेरा,इनका विसर्जन जल में न करके इन्हें खेतों में बड़े-बड़े वृक्षों के नीचे रख दें समय के साथ ये निर्माल्य मिट्टी और वर्षा के पानी के साथ मिलकर खेतों में आत्मसात् हो जायेंगे।*




