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पेट्रोल-डीजल के दाम आखिर 87 पैसे ही क्यों बढ़ रहे हैं? जानिए इसके पीछे का असली गणित

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देश में लगातार पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ती जा रही हैं। बीते कुछ दिनों में तेल कंपनियों ने पेट्रोल के दाम दो बार बढ़ाए और दोनों बार बढ़ोतरी ठीक 87 पैसे प्रति लीटर की हुई। ऐसे में आम लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि आखिर हर बार 87 पैसे ही क्यों बढ़ाए जा रहे हैं? इसके पीछे तेल कंपनियों की खास रणनीति और पूरा गणित छिपा हुआ है।

1. 87 पैसे बढ़ाने के पीछे क्या है खेल?

तेल कंपनियां अचानक बड़ा झटका देने से बचना चाहती हैं। अगर एक ही बार में पेट्रोल 5 या 10 रुपये महंगा कर दिया जाए तो जनता में भारी नाराजगी फैल सकती है। इसलिए कंपनियां धीरे-धीरे छोटे-छोटे हिस्सों में कीमत बढ़ाती हैं। 87 पैसे जैसी रकम कोई तय नंबर नहीं होती, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय बाजार, टैक्स और लागत के हिसाब से निकाला गया आंकड़ा होता है।

आम आदमी पर एकदम बोझ नहीं डालना चाहती कंपनियां

अगर पेट्रोल-डीजल के दाम अचानक ज्यादा बढ़ जाएं तो इसका सीधा असर ट्रांसपोर्ट पर पड़ता है। ट्रक भाड़ा बढ़ता है, सब्जी-मंडी महंगी होती है और ऑनलाइन डिलीवरी से लेकर रोजमर्रा का सामान तक महंगा हो जाता है। यही वजह है कि तेल कंपनियां धीरे-धीरे दाम बढ़ाकर लोगों को “धीमा झटका” देती हैं ताकि एकदम से जेब पर भारी असर न पड़े।

मध्य पूर्व तनाव बना बड़ी वजह

मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव की वजह से कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर क्रूड ऑयल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होते ही भारत में भी असर दिखाई देने लगता है। डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी भी पेट्रोल-डीजल को और महंगा कर देती है।

क्या है डायनामिक प्राइसिंग सिस्टम?

भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें “डायनामिक प्राइसिंग सिस्टम” के तहत तय होती हैं। इसमें हर दिन अंतरराष्ट्रीय क्रूड ऑयल की कीमत, डॉलर-रुपया एक्सचेंज रेट, ट्रांसपोर्ट खर्च और रिफाइनिंग कॉस्ट को जोड़ा जाता है। इसी कारण कई बार कीमतें 50 पैसे, 87 पैसे या 1.13 रुपये जैसी सटीक संख्या में बढ़ती हैं।

दिल्ली समेत बड़े शहरों में नए रेट

ताजा बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में पेट्रोल करीब 99.51 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है, जबकि डीजल 92.49 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में भी दामों में तेजी देखने को मिली है। लगातार बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की टेंशन बढ़ा दी है और लोगों का घरेलू बजट पूरी तरह बिगड़ने लगा है।

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