शाहपुर में उबाल, भीमपुर में सवाल! गैर आदिवासी अधीक्षकों की नियुक्ति क्यों?
सांध्य दैनिक खबरवाणी, बैतूल
शाहपुर के एकलव्य विद्यालय की घटना एक विद्यालय की आंतरिक समस्या नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र की विफलता है जिसे आदिवासी बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी सौंपी गई है। छात्राओं पर गर्भनिरोधक गोलियाँ देने का आरोप और भोजन जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित 250 छात्र-छात्राओं का 7 किमी पैदल मार्च- ये घटनाएँ बताती हैं कि निगरानी और जवाबदेही का ढाँचा खोखला है। सहायक आयुक्त विवेक पांडे ने कलेक्टर के निर्देश के बावजूद मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी पूरी नहीं की। सवाल उठता है कि पूरे देश में आदिवासी शिक्षा को लेकर गंभीर प्रयासों का दावा किया जाता है, तो ज़मीनी स्तर पर यह लापरवाही क्यों?
नीतिगत व्यवस्था का उल्लंघन और भीमपुर की स्थिति
शाहपुर की घटना के समानांतर भीमपुर ब्लॉक के हाल भी चिंताजनक है। यहाँ आदिवासी छात्रावासों में गैर-आदिवासी अधीक्षकों की नियुक्ति की गई है, जबकि नियम स्पष्ट हैं आदिवासी छात्रावासों का संचालन केवल आदिवासी अधीक्षकों के हाथों में होना चाहिए। मध्यप्रदेश आदिम जाति कल्याण विभाग की नीतियों और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए बने विशेष प्रावधानों के बावजूद यह नियुक्ति न केवल नियम-विरुद्ध है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 46 के उस आश्वासन का उल्लंघन भी है, जिसमें राज्य को आदिवासी समाज की शिक्षा और सामाजिक उन्नति की विशेष जिम्मेदारी सौंपी गई है। भीमपुर में नियम-विरुद्ध नियुक्तियाँ यह संकेत देती हैं कि शाहपुर जैसी स्थितियाँ किसी भी समय यहाँ भी पनप सकती हैं। यदि जिम्मेदार अधिकारी इस उल्लंघन को नजरअंदाज कर सकते हैं, तो क्या यह मान लिया जाए कि आदिवासी बच्चों की तकलीफ़ तब तक दिखाई नहीं देगी जब तक वे सडक़ों पर उतरकर अपना आक्रोश न दिखाएँ?
राजनीति का मौन और पाखंड
यह प्रश्न केवल प्रशासन तक सीमित नहीं है। भाजपा, कांग्रेस और जयस जैसे संगठन आदिवासी समाज की बात करने का दावा तो करते हैं, पर क्या वे इस मुद्दे पर आगे आएंगे? क्या वे भीमपुर के छात्रावासों में हुए नियम-विरुद्ध अधीक्षक नियुक्तियों को समाप्त कराने के लिए ज्ञापन देंगे, आंदोलन करेंगे? या फिर आदिवासी अधिकारों की लड़ाई भी केवल चुनावी मंचों और नारों तक ही सीमित रहेगी? यदि इन दलों को सचमुच आदिवासी बच्चों की चिंता है, तो उन्हें इस नियुक्ति को रद्द कराने की दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए। वरना यह मानना होगा कि राजनीतिक दल केवल अपने आकाओं के लिए लड़ते हैं, आदिवासी बच्चों के लिए नहीं।
जवाबदेही का समय
शाहपुर की घटना प्रशासन के लिए अलार्म है और भीमपुर उसका अगला पड़ाव हो सकता है। सहायक आयुक्त विवेक पांडे को स्पष्ट करना होगा कि नियम-विरुद्ध नियुक्तियाँ क्यों की गईं और क्यों निगरानी की जिम्मेदारी पूरी नहीं की गई। साथ ही, राजनीतिक दलों को भी यह साबित करना होगा कि उनकी प्रतिबद्धता केवल नारों तक नहीं है। आदिवासी बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा पर समझौता संविधान, नीतियों और लोकतांत्रिक वादों—तीनों के साथ विश्वासघात है। इसे टालना अब संभव नहीं। शाहपुर ने जो चेतावनी दी है, भीमपुर में वह दोहराई न जाए—यह जिम्मेदारी प्रशासन और राजनीति, दोनों की है।
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