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शस्त्र लाइसेंस का ‘बड़ा खेल’ रसूखदारों को पलक झपकते ही मंजूरी, जरूरतमंद कलेक्ट्रेट में काटने को मजबूर चक्कर….

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खबरवाणी

शस्त्र लाइसेंस का ‘बड़ा खेल’ रसूखदारों को पलक झपकते ही मंजूरी, जरूरतमंद कलेक्ट्रेट में काटने को मजबूर चक्कर….

खबर वाणी का बड़ा खुलासा जल्द सामने आएंगे शस्त्र लाइसेंस पाने वाले प्रशासनिक अधिकारियों के नाम……

खबरवाणी सुशील कुशवाह अशोक नगर। जिला प्रशासन और शस्त्र लाइसेंस अनुभाग इन दिनों गंभीर सवालों के घेरों में है। जिले में शस्त्र लाइसेंस जारी करने की आड़ में एक बड़े खेल का खुलासा हुआ है, जिसने प्रशासनिक पारदर्शिता और न्याय व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। एक तरफ जहां जिले के प्रभावशाली वर्ग, रसूखदारों और आला अधिकारियों के पुत्र-पुत्रियों को पलक झपकते ही बंदूक और पिस्टल के लाइसेंस जारी किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वास्तविक जरूरतमंद और गरीब लोग एक-एक लाइसेंस के लिए महीनों से कलेक्ट्रेट के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

विश्वस्त सूत्रो के माध्यम से सामने आई जानकारियों के अनुसार, बीते कुछ वर्षों में जारी किए गए शस्त्र लाइसेंसों में एक खास पैटर्न देखने को मिला है। जिले में पदस्थ रहे कई वरिष्ठ अधिकारियों, प्रशासनिक कर्मचारियों और राजनीतिक पहुंच रखने वाले लोगों ने अपने बालिग होते ही बेटे-बेटियों के नाम पर लाइसेंस स्वीकृत करवा लिए। हैरानी की बात यह है कि जिन रसूखदार युवाओं को लाइसेंस दिए गए हैं, उनमें से अधिकांश न तो किसी व्यावसायिक गतिविधि में संलिप्त हैं और कथित तौर पर न ही उन पर किसी तरह का जान-माल का प्रत्यक्ष खतरा है। इसके बावजूद उनकी फाइलों को ‘अति-संवेदनशील’ और ‘विशेष आवश्यकता’ की श्रेणी में रखकर कुछ ही हफ्तों में स्वीकृति दे दी गई।  दूसरी ओर, जिले के दूर-दराज के गांवों से आने वाले किसान, छोटे व्यापारी और आपराधिक धमकियों का सामना कर रहे आम लोग कलेक्ट्रेट के गलियारों में दर-दर भटक रहे हैं।

अशोक नगर कलेक्ट्रेट परिसर के आसपास शस्त्र लाइसेंस दिलाने वाले दलालों का एक संगठित नेटवर्क सक्रिय तो नहीं है। कथित तौर पर आरोप यह है कि सुविधा शुल्क (रिश्वत) दिए आम आदमी की फाइल का एक इंच आगे बढ़ना नामुमकिन है। गरीब किसान और छोटे व्यापारी जो अपनी फसल की सुरक्षा या निजी हिफाजत के लिए लाइसेंस चाहते हैं, वे दलालों की मांगी गई मोटी रकम चुकाने में असमर्थ होते हैं। परिणामस्वरूप, उनकी फाइलें अस्वीकृत कर दी जाती हैं या फिर अनिश्चितकाल के लिए ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं। हालांकि, कलेक्ट्रेट की फाइलों में दर्ज आंकड़े और कतार में खड़े मायूस गरीब आवेदकों के चेहरे प्रशासन के इन दावों की हकीकत बयां करने के लिए काफी हैं। देखना यह होगा कि क्या शासन इस बड़े खेल पर संज्ञान लेकर निष्पक्ष कार्रवाई करता है या गरीब जनता यूं ही न्याय और सुरक्षा के लिए दर-दर भटकती रहेगी।

प्रशासनिक अधिकारियों के स्वजनों को बंदूक लाइसेंस पर चर्चा:-

अशोकनगर जिले में प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा मानकों के तहत शस्त्र लाइसेंस जारी करने की एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया है। हाल के दिनों में जिले में वर्तमान में पदस्थ उच्च प्रशासनिक अधिकारियों और उनके परिजनों के नाम पर शस्त्र (बंदूक) लाइसेंस स्वीकृत होने के मामले चर्चा में रहे हैं। इस प्रक्रिया को लेकर जहां एक ओर प्रशासनिक स्तर पर सुरक्षा जरूरतों, नियमानुसार आवेदनों की जांच और पात्रता को आधार बताया गया है, वहीं दूसरी ओर आम जनता के बीच इसे लेकर पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल भी उठे हैं। प्रशासन का तर्क है कि सभी लाइसेंस नियमानुसार और सुरक्षा जांच के बाद ही स्वीकृत किए गए हैं। आगे आने वाले अंकों में खबर वाणी अखबार नाम सहित प्रशासनिक अधकारियों के नाम उजागर करेगा।

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