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“मां के बिना कैसे जिएं…?”: माता-पिता के विवाद में अपनों की ही जंग लड़ते दो मासूमों की करुण दास्तां

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खबरवाणी

“मां के बिना कैसे जिएं…?”: माता-पिता के विवाद में अपनों की ही जंग लड़ते दो मासूमों की करुण दास्तां

आमला।

घर की चारदीवारी—जिसे बच्चों की दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना होना चाहिए था—आज दो मासूमों के लिए एक खुली अदालत बन चुकी है। यह कहानी किसी फिल्मी परदे की नहीं, बल्कि आमला के उस कड़वे सच की है, जहां 14 साल के बड़े भाई और 12 साल की छोटी बहन ने अपने टूटते हुए आशियाने को बचाने के लिए खुद अदालत की शरण ली है।

पिछले दो सालों से माता-पिता के बीच चल रहे वैवाहिक कलह की आग में इन दोनों मासूमों का बचपन झुलस रहा है। मां की तरफ से तलाक की अर्जी और पिता की तरफ से पत्नी को वापस घर लाने की कानूनी जिद के बीच, इन बच्चों की चीखें किसी को सुनाई नहीं दे रही थीं—सिवाय उस अदालत के दरवाजे के, जहां उन्होंने वकीलों के जरिए अपनी फरियाद पहुंचाई है।

बच्चों की नम आंखें और एक मासूम गुहार

अदालत में पेश किए गए आवेदन में दोनों बच्चों ने जो शब्द कहे हैं, वे किसी भी पत्थर दिल इंसान को भी झकझोर कर रख देने के लिए काफी हैं। बच्चों ने दर्द भरे शब्दों में कहा है:

“वो हमारी मां हैं… हमारे बिना रह सकती हैं, पर हम मां के बिना नहीं रह सकते। माता-पिता का यह आपसी झगड़ा है, इसमें हमारा क्या दोष है?”

बच्चों की मांग सिर्फ इतनी सी है कि वे किसी एक को चुनना नहीं चाहते—वे मां और पिता दोनों का प्यार चाहते हैं। उनकी सबसे बड़ी और शायद सबसे लाचार इच्छा यह है कि उनकी मां उनके साथ रहे और उनके इस उजड़ते हुए पारिवारिक जीवन में किसी भी तीसरे व्यक्ति का दखल न हो।

 

कानून की चौखट पर बच्चों का इम्तिहान।

 

कानून की नजर में माता-पिता के इस रणक्षेत्र में बच्चों का भविष्य सबसे ज्यादा अधर में है। शिवम उपाध्य अधिवक्ता एवम् वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना है कि संरक्षकता कानून के तहत यदि बच्चे इतने समझदार हैं कि वे अपनी सही-गलत की पहचान कर सकें, तो अदालत उनकी भावनाओं पर गौर जरूर करती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या अदालत के कागजात और तारीखें इन मासूमों के दिल पर लगे जख्मों को भर पाएंगी?

दो साल से अदालतों के चक्कर काटते माता-पिता शायद यह भूल चुके हैं कि इस कानूनी लड़ाई का फैसला चाहे जिसके पक्ष में जाए, हार सिर्फ और सिर्फ उन दो बच्चों की होगी जो हर रात यह दुआ करते हैं कि सुबह उनका बिखरा हुआ परिवार फिर से एक हो जाए।

क्या समाज और कानून के इस पहरे के बीच इन मासूमों की करुण पुकार पर कोई सुनवाई होगी, या फिर वे हमेशा यूं ही अपनों की लड़ाई में

पिसते रहेंगे?

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