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कागजों में पूरा, हकीकत में अधूरा: लाखों का स्टॉप डेम बना सरकारी धन की बर्बादी का प्रतीक
2025 में कार्य पूर्ण दिखाया, ग्रामीणों के विरोध के बाद 2026 में हुआ निर्माण; आज तक नहीं लगी प्लेट, गुणवत्ता पर गंभीर सवाल
भौंरा। ग्राम पंचायत काँटावाड़ी में 15वें वित्त आयोग की राशि से निर्मित स्टॉप डेम सरकारी निर्माण कार्यों की निगरानी व्यवस्था और गुणवत्ता नियंत्रण पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। लाखों रुपये की लागत से बनाए गए इस स्टॉप डेम के सूचना बोर्ड पर कार्य प्रारंभ तिथि 25 दिसंबर 2024 और पूर्णता तिथि 5 फरवरी 2025 अंकित है, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि जिस समय सरकारी रिकॉर्ड में कार्य पूर्ण बताया गया, उस समय मौके पर निर्माण कार्य ही नहीं हुआ था।
ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2025 में कागजों में स्टॉप डेम को पूर्ण दर्शाकर भुगतान और औपचारिकताएं पूरी कर ली गईं, जबकि वास्तविक निर्माण कार्य ग्रामीणों के विरोध और शिकायतों के बाद वर्ष 2026 में शुरू कराया गया। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब निर्माण कार्य धरातल पर मौजूद ही नहीं था तो उसे पूर्ण बताने का आधार क्या था?
मामला यहीं तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों का आरोप है कि जिस उद्देश्य से स्टॉप डेम का निर्माण कराया गया था, वह आज तक पूरा नहीं हो सका है। निर्माण के दो वर्ष बीत जाने के बावजूद स्टॉप डेम में पानी रोकने के लिए आवश्यक प्लेट (गेट) नहीं लगाई गई है। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत ने न तो प्लेट खरीदी और न ही उसका निर्माण कराया। परिणामस्वरूप बारिश का पानी बिना रुके बह जाता है और लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी यह संरचना अपने मूल उद्देश्य को पूरा नहीं कर पा रही।
गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल
ग्रामीणों ने निर्माण कार्य को गुणवत्ता हीन बताते हुए आरोप लगाया है कि कार्य में निर्धारित मानकों के अनुसार सामग्री का उपयोग नहीं किया गया। निर्माण में सीमेंट, रेत और गिट्टी का अनुपात तकनीकी मानकों के अनुरूप नहीं रखा गया, जिससे संरचना की मजबूती पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई स्थानों पर निर्माण की फिनिशिंग और गुणवत्ता देखकर ही कार्य की वास्तविक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
जानकारों के अनुसार किसी भी स्टॉप डेम निर्माण में मजबूत नींव, उच्च गुणवत्ता की सामग्री, निर्धारित अनुपात में कंक्रीट मिश्रण, उचित क्योरिंग और तकनीकी मानकों का पालन अनिवार्य होता है। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि यहां इन मूलभूत मानकों की ही अनदेखी की गई। यदि निर्माण कार्य की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए तो कई गंभीर खामियां उजागर हो सकती हैं।
अधिकारियों की चुप्पी ने बढ़ाए सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि यदि जनपद पंचायत और संबंधित विभाग के अधिकारी नियमित निरीक्षण करते तो कार्य को कागजों में पूर्ण दिखाने और अधूरे निर्माण को वर्षों तक लटकाए रखने जैसी स्थिति पैदा नहीं होती। निगरानी के अभाव ने ग्राम पंचायत को मनमानी करने का अवसर दिया, जिसका खामियाजा आज ग्रामीण भुगत रहे हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि एक ओर शासन जल संरक्षण और भू-जल संवर्धन के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है, वहीं दूसरी ओर धरातल पर ऐसे निर्माण कार्य सरकारी धन की उपयोगिता पर ही प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। यदि समय पर प्लेट लगाकर गुणवत्तापूर्ण निर्माण किया जाता तो यह स्टॉप डेम अब तक किसानों और ग्रामीणों के लिए उपयोगी साबित हो सकता था।
जांच की मांग तेज
ग्रामीणों ने पूरे मामले की तकनीकी और वित्तीय जांच की मांग करते हुए कहा है कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि कार्य को निर्धारित समय में पूर्ण क्यों दर्शाया गया, जबकि वास्तविक निर्माण बाद में हुआ। साथ ही निर्माण में उपयोग की गई सामग्री की गुणवत्ता, भुगतान प्रक्रिया और प्लेट नहीं लगाए जाने की जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच होती है तो कागजी पूर्णता, निर्माण में देरी, गुणवत्ता संबंधी लापरवाही और सरकारी धन के उपयोग से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।





