खबरवाणी
आमला: सड़कों पर बेसहारा गोवंश की समस्या, प्रशासनिक उदासीनता और व्यवस्था पर गंभीर सवाल
आमला:
शहर के प्रमुख चौराहों, मुख्य मार्गों से लेकर अंदरूनी गलियों तक इन दिनों आवारा और बेसहारा गोवंश का भारी जमावड़ा लगा हुआ है। खासकर बरसात के इस मौसम में स्थिति और भी विकट हो गई है, जब ये बेजुबान पशु सड़कों के बीचों-बीच बैठने को मजबूर हैं। ऐसे में यह यक्ष प्रश्न हर नागरिक के मन में कौंध रहा है—आखिर इन बेजुबानों की इस दुर्दशा का असली दोषी कौन है? क्या ये बेजुबान खुद ज़िम्मेदार हैं, या वो मालिक जिन्होंने स्वार्थ सिद्ध होने के बाद इन्हें लावारिस छोड़ दिया?
ट्रैक्टर युग की मार और उपयोगिता खत्म होने का दंश।
सच्चाई बेहद कड़वी और साफ है। जिस गोवंश को कभी किसान अपने खेत-खलिहानों का मुख्य आधार मानते थे, आज वे सड़कों पर भटकने को मजबूर हैं। आधुनिक खेती में ट्रैक्टरों के बढ़ते उपयोग ने नंदी (बैलों) की जरूरत को लगभग खत्म कर दिया है। यही हाल देशी गायों का भी है; दूध देना बंद करने या बूढ़े हो जाने पर अधिकांश पशुपालक इन्हें अपनाने से कतराते हैं और सीधा सड़कों पर छोड़ देते हैं। हैरानी की बात यह है कि फसलों के मुआवजे, खाद-बीज की किल्लत और अपने अन्य अधिकारों के लिए आए दिन आंदोलन करने वाले किसान संगठन भी इस गंभीर विषय पर पूरी तरह मौन हैं। गोवंश के आश्रय और उनके अधिकारों के लिए किसी भी किसान संघ द्वारा आज तक कोई पुरजोर आवाज नहीं उठाई गई है।
जिम्मेदारों की चुप्पी और खोखले दावे।
शासन-प्रशासन की टालमटोल और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी के कारण सड़कों से गोवंश को हटाकर उचित स्थान पर पहुंचाने के लिए मीडिया द्वारा समय-समय पर आवाज उठाई जाती है, लेकिन प्रशासन के स्तर पर कभी कोई ठोस या ईमानदार प्रयास नजर नहीं आया। मंचों से ‘जय माता की’ और ‘गोहत्या बंद हो’ के नारे लगाने वाले राजनीतिक दलों के कद्दावर नेताओं से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों तक, किसी की भी नियत इस दिशा में ठोस काम करने की नहीं दिखी। जब भी यह मुद्दा उठता है, प्रशासन टालमटोल वाला रवैया अपनाकर पल्ला झाड़ लेता है।
बड़ा सवाल और समाधान: गोशालाओं का निर्माण।
क्या पंचायत स्तर से लेकर नगरपालिका परिषद तक सरकारी गोशालाओं का निर्माण नहीं होना चाहिए? यदि ऐसा हो, तो गोवंश को सुरक्षित आश्रय मिलेगा, उनके गोबर से खाद व अन्य उपयोगी सामग्रियां (जैसे गो-काठ) बनाई जा सकेंगी, सड़कों पर गंदगी से मुक्ति मिलेगी और बाजारों में गोवंश के कारण बना रहने वाला दुर्घटना व भय का माहौल भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
गोशाला प्रबंधन का दर्द।
इस गंभीर मुद्दे पर नगर पालिका परिषद के वार्ड नंबर 5 (श्री महावीर हनुमान गोशाला) स्थित गोशाला प्रबंधन का कहना है कि शहर की सड़कों पर गोवंश की दुर्दशा, आए दिन होने वाले एक्सीडेंट और बीमार पशुओं को देखकर मन अत्यंत दुखी होता है। इसी पीड़ा के कारण इस गोशाला का निर्माण किया गया है। हम जनसहयोग के माध्यम से बीमार और घायल पशुओं का रेस्क्यू कर उनका इलाज तो करते हैं, लेकिन शासन-प्रशासन से किसी भी प्रकार की आर्थिक मदद नहीं मिलती। केवल आम जनता के सहयोग से इतनी बड़ी संख्या में गोवंश का भररण-पोषण, बुनियादी निर्माण और संचालन करना एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है। गोशाला में गोवंश की संख्या लगातार बढ़ रही है, ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह शहर के आसपास सरकारी सहयोग से बड़ी गोशालाओं का निर्माण कराए।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब यह देखना अहम होगा कि नगर पालिका प्रशासन और स्थानीय प्रशासन इस दिशा में कब और क्या ठोस कदम उठाता है, ताकि आम जनता और बेजुबानों दोनों को इस विकट समस्या से राहत मिल सके।
निष्कर्ष
बयान और दावों से इतर धरातल की हकीकत यह है कि जब तक प्रशासन और समाज मिलकर इस समस्या का स्थायी हल नहीं निकालेंगे, तब तक ये बेजुबान सड़कों पर तड़ने और राहगीर हादसों का शिकार होने को मजबूर रहेंगे। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मूक चीख को कब सुनता है और कब कागजी दावों से आगे बढ़कर जमीन पर काम शुरू होता है।





