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संस्कृति किड्स स्कूल’ में प्रशासनिक अनदेखी का बड़ा खेल, बिना खेल मैदान के बंद कमरों में घुट रहा मासूमों का बचपन……

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खबरवाणी

संस्कृति किड्स स्कूल’ में प्रशासनिक अनदेखी का बड़ा खेल, बिना खेल मैदान के बंद कमरों में घुट रहा मासूमों का बचपन……

किड्स स्कूल की कागजी बाजीगरी, डीपीसी सूची से नाम नदारद, बच्चों के स्वास्थ्य से खिलवाड़…..

अशोकनगर। निजी शिक्षा व्यवस्था की चमकदार तस्वीर और बड़े-बड़े दावों के पीछे छिपा प्रशासनिक अनदेखी का एक बड़ा खेल उजागर हुआ है। शहर के संस्कृति किड्स स्कूल में पढ़ने वाले मासूम बच्चों के स्वास्थ्य और शारीरिक विकास से सीधे तौर पर खिलवाड़ किया जा रहा है। कागज़ों में तो स्कूल की व्यवस्थाएं दुरुस्त दिखाई जाती हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि इस संस्थान के पास बच्चों के खेलने के लिए कोई खेल का मैदान ही उपलब्ध नहीं है।

संस्कृति किड्स स्कूल प्रशासन से जब खेल मैदान और बच्चों की खेलकूद गतिविधियों के बारे में पड़ताल की गई, तो जो सच सामने आया वह चौंकाने वाला है। पड़ताल में पाया गया की कथित तौर पर बच्चों को खेलने के लिए शहर से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित ‘संस्कृति एन इंग्लिश स्कूल’ ले जाया जाता होगा अब सवाल यह उठता है कि क्या रोज़ाना कथित तौर पर छोटे-छोटे मासूम बच्चों को 5 किलोमीटर दूर सिर्फ खेलकूद के लिए ले जाना संभव और सुरक्षित है क्या कथित तौर पर हर दिन बच्चों को बसों या वाहनों में भरकर 5 किलोमीटर दूर ले जाया जाता है  यह केवल कागजी खानापूर्ति और कागजों पर नियम-शर्तें पूरी करने का एक बहाना भर है। असलियत में मासूम बच्चे एक बंद परिसर में ही अपनी पूरी पढ़ाई करने को मजबूर हैं।

यू डाइज कोड में ‘संस्कृति एन इंग्लिश स्कूल’ का नाम, डीपीसी सूची से किड्स स्कूल नदारद:-

इस मामले में सबसे बड़ा खेल यू-डाइज कोड और शिक्षा विभाग के दस्तावेजों में देखने को मिला है। सरकारी यू डाइज डेटाबेस में संस्कृति किड्स स्कूल के बजाय ‘संस्कृति एन इंग्लिश स्कूल’ का नाम दर्ज है। इतना ही नहीं, डीपीसी कार्यालय की अधिकृत निजी स्कूल सूची की जब पड़ताल की गई, तो उसमें संस्कृति किड्स स्कूल का नाम तक दर्ज नहीं मिला। डीपीसी सूची में नाम का न होना यह साबित करता है कि या तो यह संस्थान बिना वैध मान्यताओं या फिर किसी अन्य स्कूल की मान्यता की आड़ में अवैध रूप से संचालित किया जा रहा है। शिक्षा विभाग के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि मान्यता प्राप्त करने वाले प्रत्येक प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय के पास अपना खुद का सर्व-सुविधायुक्त खेल मैदान अनिवार्य रूप से होना चाहिए। यदि मैदान नहीं है, तो मान्यता नहीं दी जा सकती। लेकिन संस्कृति किड्स स्कूल के मामले में नियमों को ताक पर रखकर काम किया जा रहा है अपनी जमीन पर खेल का मैदान न होना मान्यता संबंधी नियमों का खुला उल्लंघन है। यू डाइज कोड किसी और संस्था के नाम पर इस्तेमाल होना कागजी हेरफेर की ओर इशारा करता है। डीपीसी की सूची में एंट्री न होना इस बात की पुष्टि करता है कि विभागीय निगरानी तंत्र पूरी तरह से सोया हुआ है।

संस्कृति किड्स स्कूल का यह मामला केवल एक निजी शिक्षण संस्थान की लापरवाही नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग के सुस्त निगरानी तंत्र और कागजी दावों पर गहरा तमाचा है। अपने स्वयं के खेल मैदान के बिना स्कूल का संचालन और यू-डाइज डेटाबेस से लेकर डीपीसी सूची तक में भारी अनियमितताएँ स्पष्ट रूप से नियमों की धज्जियाँ उड़ाने और कागजी हेरफेर को दर्शाती हैं। दूर-दराज़ मैदान में बच्चों को ले जाने का दावा ज़मीनी सच्चाई से कोसों दूर और बच्चों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ प्रतीत होता है। यदि प्रशासनिक स्तर पर इस पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जाँच नहीं की गई, तो मासूम बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास बंद कमरों की चहारदीवारी में घुटकर रह जाएगा।

इनका कहना है:-

जिन स्कूलों में खेल का मैदान नहीं है निरीक्षण किया गया है, एक ही मान्यता पर 5 किमी की दूरी पर दो अलग-अलग इमारतें गैर-कानूनी तरीके से संचालित की जा रही हैं, तो इस मामलेकी जांच कराई जाएगी जांच के बाद कार्यवाही की जाएगी।

राहुल शर्मा
डीपीसी अशोकनगर

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