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ग्राम पंचायत ककरुआ राय में विकास के नाम पर ‘काली चूरी’ का खेल, कागजों पर भसुआ दर्शाकर लाखों का गबन

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खबरवाणी

ग्राम पंचायत ककरुआ राय में विकास के नाम पर ‘काली चूरी’ का खेल, कागजों पर भसुआ दर्शाकर लाखों का गबन…..

ऑनलाइन पोर्टल पर भसुआ के ऊंचे दाम, मौके पर बिछाई जा रही घटिया सामग्री उप यंत्री के मूल्यांकन और सत्यापन पर उठे गंभीर प्रश्न, जनपद स्तर तक फैला संदेहास्पद जाल………

 

अशोकनगर। ग्राम पंचायत ककरुआ राय में विकास कार्यों के नाम पर जो खेल खेला जा रहा है, वह न केवल प्रशासनिक अनदेखी का जीवंत प्रमाण है बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई से वसूले गए टैक्स के पैसों का खुला गबन भी है। कागज़ी दावों और धरातल की हकीकत में इतना बड़ा ज़मीन-आसमान का अंतर है कि जिसे देखकर व्यवस्था के प्रति आम जनमानस का गुस्सा भड़कना लाज़मी है। यहाँ चल रहे विकास कार्यों में पारदर्शता और गुणवत्ता के सारे नियमों को ताक पर रखकर सरकारी खजाने की खुलकर लूट की जा रही है। ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड किए गए कागज़ी दस्तावेजों और बिलों की पड़ताल करें तो उसमें निर्माण सामग्री के रूप में भसुआ (बारीक रेत/डस्ट) के उपयोग का दावा किया गया है और उसी दर पर शासन से लाखों रुपये के बिल पास करा लिए गए हैं। परंतु जब निष्पक्ष रूप से ज़मीनी हकीकत का जायजा लिया गया, तो चौंकाने वाला सच सामने आया निर्माण स्थल पर भसुआ के बजाय घटिया दर्जे की काली चूरी बिछाई जा रही है।

 

भ्रष्टाचार के इस खेल को बड़े ही शातिराना तरीके से अंजाम दिया गया है। यह सीधे तौर पर शासकीय राशि के गबन का मामला है। बिलों में किसी और सामग्री का उल्लेख करना और मौके पर घटिया सामग्री लगाकर फर्जी बिलिंग के सहारे सरकारी फंड की निकासी करना न केवल वित्तीय अनियमितता है, बल्कि यह एक संगीन आपराधिक मामला भी है। सवाल यह उठता है कि क्या यह कारनामा केवल पंचायत स्तर के प्रतिनिधियों की मिलीभगत से संभव है उप यंत्री द्वारा बिना भौतिक सत्यापन और मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार किए पोर्टल पर बिलों का अनुमोदन कैसे हो गया अगर अधिकारी समय-समय पर निर्माण स्थलों का निरीक्षण करते, तो कागज़ और ज़मीन का यह फर्क तुरंत पकड़ा जाता। यह मौन साफ़ संकेत देता है कि इस भ्रष्टाचार का जाल केवल ग्राम पंचायत ककरुआ राय तक सीमित नहीं है, बल्कि जनपद पंचायत स्तर के तंत्र की मूक सहमति या लापरवाही के बिना इतना बड़ा फर्जीवाड़ा अंजाम देना नामुमकिन है।

 

सरकारी निर्माण कार्य गाँव के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और ग्रामीणों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए मंजूर किए जाते हैं। लेकिन जब आधार में ही घटिया काली चूरी का इस्तेमाल होगा, तो यह निर्माण कितने दिन टिक पाएगा? पहली ही बारिश या मामूली दबाव में यह सड़कें और निर्माण ध्वस्त हो जाएँगे। नुकसान सिर्फ़ पैसों का नहीं हो रहा, बल्कि उस ग्रामीण जनता के भरोसे का हो रहा है जो विकास की उम्मीद लगाए बैठी है। कागज़ों में सड़क, नाली या पक्का निर्माण चमक रहा है और ज़मीन पर ग्रामीणों को केवल धूल और घटिया निर्माण का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। यदि इस भ्रष्टाचार पर तुरंत सख्त कदम नहीं उठाए गए और दोषियों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा गया, तो ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ का सरकारी दावा सिर्फ़ भाषणों तक सीमित रह जाएगा।

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