Search ई-पेपर ई-पेपर WhatsApp

जनसुनवाई का कड़वा सच: जिन कामों का पंचायत स्तर होना चाहिए निपटान उसके लिए भी कलेक्टर के चक्कर काट रहे ग्रामीण….

By
On:

खबरवाणी

जनसुनवाई का कड़वा सच: जिन कामों का पंचायत स्तर होना चाहिए निपटान उसके लिए भी कलेक्टर के चक्कर काट रहे ग्रामीण….

विभागीय अधिकारियों की अनदेखी और टालमटोल की नीति से परेशान जनता छोटे-छोटे कामों के लिए जिला मुख्यालय पहुंचने को मजबूर आवेदक…..

अशोकनगर। जिला मुख्यालय पर प्रत्येक मंगलवार को आयोजित होने वाली जनसुनवाई का मूल उद्देश्य जनता की ऐसी समस्याओं का निवारण करना है, जिनका समाधान निचले स्तर पर नहीं हो पा रहा है। लेकिन अशोकनगर में स्थिति इसके ठीक उलट नजर आ रही है। पंचायत और ब्लॉक स्तर पर आसानी से निपटाए जा सकने वाले मामूली कार्यों के लिए भी आवेदकों और लाभार्थियों को जिला मुख्यालय तक दौड़ लगानी पड़ रही है। जनसुनवाई में उमड़ रही आवेदकों की भारी भीड़ यह साफ बयां कर रही है कि निचले स्तर के अधिकारी और कर्मचारी अपने दायित्वों को लेकर बिल्कुल गंभीर नहीं हैं।

जनसुनवाई में पहुंचने वाले आवेदकों में अधिकांश लोग ऐसे होते हैं जिनकी समस्याएं अत्यंत सामान्य प्रकृति की हैं। जैसे राशन कार्ड में नाम जुड़वाना या सुधरवाना,वृद्धावस्था या कल्याणी पेंशन की स्वीकृतियां,नामांतरण, फौती और सीमांकन के मामूली मामले,प्रधानमंत्री आवास योजना की किश्तों का रुकना ,गांव में हैंडपंप सुधार या नाली-सड़क की छोटी शिकायतें ये तमाम कार्य ऐसे हैं, जिन्हें ग्राम पंचायत सचिव, रोजगार सहायक, पटवारी या जनपद स्तर के अधिकारी मौके पर ही निपटा सकते हैं। लेकिन निचले स्तर पर आवेदकों को सीधे जवाब देने के बजाय “ऊपर से काम होगा” कहकर टाल दिया जाता है, जिससे निराश होकर आवेदक कलेक्टर के समक्ष गुहार लगाने को मजबूर हैं।

अधिकारियों की गैर-जिम्मेदाराना कार्यशैली पर उठते सवाल:- मैदानी अमला अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन बना हुआ है। जब किसी कार्य के लिए हितग्राही पंचायत या ब्लॉक कार्यालय पहुंचता है, तो उसे महीनों तक चक्कर कटवाए जाते हैं। विभागीय कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए आवेदकों को लटकाने की नीति अपनाते हैं। यदि निचले स्तर के अधिकारी अपनी कार्यकुशलता और सजगता का थोड़ा भी परिचय दें, तो 70 फीसदी समस्याओं का समाधान गांव स्तर पर ही हो सकता है। जनसुनवाई में आवेदकों की बढ़ती संख्या जिले के विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है। दूर-दराज के गांवों से जिला मुख्यालय पहुंचने वाले ग्रामीणों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। मजदूरी छोड़कर, किराया लगाकर और दिनभर भूखे-प्यासे रहकर लोग जनसुनवाई में पहुंचते हैं। जो काम शून्य रुपये और शून्य यात्रा में पंचायत में हो जाना चाहिए था, उसके लिए ग्रामीण सैकड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं। कई बुजुर्ग और दिव्यांग आवेदकों के लिए जिला मुख्यालय तक का सफर बेहद कष्टदायक साबित होता है।

जनसुनवाई को यदि वास्तव में प्रभावी बनाना है, तो केवल शिकायतों का आवेदन लेना काफी नहीं होगा। इसके लिए जिला प्रशासन को सख्त रुख अपनाना होगा ।जनसुनवाई में आने वाले जो कार्य पंचायत स्तर के पाए जाएं, उनके संबंधित सचिव, पटवारी या अधिकारी पर सीधे कार्रवाई की जाए। यह ट्रैक किया जाए कि कोई आवेदन पहली बार में नीचे के स्तर पर क्यों खारिज या लंबित रखा गया। बार -बार एक ही तरह की पंचायत स्तरीय शिकायतों का जिला स्तर पर आना संबंधित विभाग प्रमुख की नाकामी दर्शाता है, जिन पर पेनल्टी या शो-कॉज नोटिस जारी होना चाहिए। यदि समय रहते मैदानी अमले की कार्यशैली में सुधार नहीं लाया गया, तो जिला स्तरीय जनसुनवाई केवल आवेदनों का पुलिंदा बनकर रह जाएगी और आम जनता का प्रशासनिक व्यवस्था से विश्वास उठता रहेगा।

For Feedback - feedback@example.com
Home Icon Home E-Paper Icon E-Paper Facebook Icon Facebook Google News Icon Google News