खबरवाणी
बिटिया के भविष्य के खातिर पिघला दिल: दो साल की दूरियों के बाद लोक अदालत में फिर एक हुआ परिवार।
आमला
“सर… बिटिया के बिना हम दोनों नहीं रह सकते।”
एक पिता के गले से निकले इन भर्राए शब्दों ने न सिर्फ कोर्टरूम में मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं, बल्कि दो साल से तलाक की राह पर चल रहे एक बिखरते परिवार को हमेशा के लिए टूटने से बचा लिया। आमला में आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत में एक ऐसा भावुक पल सामने आया, जिसने यह साबित कर दिया कि बच्चों की मुस्कान और उनका भविष्य माता-पिता के हर अहंकार और मनमुटाव से कहीं ऊपर होता है।
प्रेम-विवाह से लेकर अलगाव तक की दास्तान।
जानकारी के मुताबिक, आमला क्षेत्र के एक दंपति ने कुछ साल पहले प्रेम-विवाह कर अपने नए जीवन की शुरुआत की थी। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन आपसी वैचारिक मतभेदों और छोटी-छोटी अनबन ने धीरे-धीरे दूरियां इतनी बढ़ा दीं कि मामला अदालत तक पहुंच गया। पिछले दो वर्षों से दोनों अलग रह रहे थे और पति ने अदालत में तलाक की याचिका दायर कर दी थी। मामला कानूनी दांव-पेच और फैसले की ओर बढ़ रहा था, लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
मध्यस्थता ने दिखाई उम्मीद की किरण।
राष्ट्रीय लोक अदालत के दौरान जब इस मामले को मीडिएशन के लिए रखा गया, तो कानूनी विशेषज्ञों और अधिवक्ताओं ने दोनों पक्षों को आमने-सामने बिठाकर सार्थक संवाद कराया। काउंसलर्स और अधिवक्ताओं ने उन्हें समझाया कि इस कानूनी लड़ाई में सबसे बड़ा नुकसान उनकी मासूम बिटिया का हो रहा है, जिसका बचपन बिना माता-पिता के साये के बिखर रहा है।
इसी बीच, जब पति ने अपनी लाडली बेटी का जिक्र करते हुए नम आंखों से कहा कि वे दोनों अपनी बेटी के बिना एक पल भी नहीं जी सकते, तो हवा का रुख ही बदल गया। पत्नी का दिल भी पिघल गया और दोनों ने गिले-शिकवे भुलाकर अपने परिवार को एक नया मौका देने का संकल्प लिया।
अदालत में गूंजी खुशी की लहर।
समझौते की मुहर लगते ही पति ने तुरंत अपनी तलाक की याचिका वापस ले ली। लोक अदालत की खंडपीठ और वहां मौजूद सभी न्यायविदों ने इस फैसले का स्वागत किया। इस पूरे भावनात्मक प्रकरण में अधिवक्ता राजेंद्र उपाध्याय की मध्यस्थता और समझाइश ने दोनों पक्षों के बीच की खाइयों को पाटने में अहम भूमिका निभाई।
लोक अदालत ने दिया बड़ा संदेश।
यह घटना इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि कानून केवल सजा या तलाक देने के लिए नहीं, बल्कि रिश्तों को जोड़ने का जरिया भी बन सकता है। आमला की इस राष्ट्रीय लोक अदालत ने यह साबित कर दिया कि अगर समय रहते समझदारी और संवाद का रास्ता अपनाया जाए, तो अदालती फाइलों में कैद होते परिवारों को टूटने से बचाया जा सकता है। आज इस परिवार की खुशियां लौट आई हैं, और सबसे ज्यादा खुश वह मासूम बिटिया है, जिसे एक बार फिर माता-पिता दोनों का प्यार और एक मुकम्म
ल आशियाना मिल गया है।





