खबरवाणी
नेहरू डिग्री कॉलेज अशोकनगर में ‘विद्यार्थी बस सुविधा’ में नियमों की धज्जियां….
बिना मानकों और बिना पीले रंग के दौड़ रही बस दो महीने का आश्वासन बीता सवाल मेहरबानी या भ्रष्टाचार……..?
अशोकनगर। उच्च शिक्षा विभाग द्वारा प्रदेश के शासकीय महाविद्यालयों को ‘प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस’ का दर्जा देकर वहां छात्र-छात्राओं को सर्वसुविधायुक्त वातावरण और संसाधन उपलब्ध कराने का दावा किया गया था। इसी कड़ी में शासकीय नेहरू स्नातकोत्तर महाविद्यालय अशोकनगर में दूर-दराज से आने वाले छात्र-छात्राओं की सहूलियत के लिए “विद्यार्थी बस सुविधा” की शुरुआत की गई। लेकिन उच्च शिक्षा का यह ‘एक्सीलेंस’ केंद्र वर्तमान में गंभीर अनियमितताओं और नियमों की अनदेखी को लेकर सुर्खियों में है। महाविद्यालय अशोकनगर प्रबंधन और बस ठेकेदार की कथित मिलीभगत के कारण छात्रों की सुरक्षा को ताक पर रखकर बिना तय मानकों के ‘नियम विरुद्ध’ तरीके से बसों का संचालन धड़ल्ले से किया जा रहा है।
सड़क सुरक्षा और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार छात्र-छात्राओं और विद्यार्थियों को ले जाने वाले सभी शैक्षणिक वाहनों का रंग अनिवार्य रूप से पीला (स्कूल/कॉलेज बस येलो) होना चाहिए। पीला रंग दूर से दिखाई देने और हादसों की संभावना को कम करने के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता है। अशोकनगर नेहरू महाविद्यालय द्वारा जून माह में जारी की गई निविदा की शर्तों में भी इस बात का स्पष्ट उल्लेख और प्राथमिक शर्त थी कि “विद्यार्थी बस सुविधा” के अंतर्गत केवल पीले रंग की बस को ही प्राथमिकता दी जाएगी और उसी का संचालन मान्य होगा। परंतु, धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। अशोकनगर नेहरू महाविद्यालय परिसर में संचालित हो रही बस का रंग न तो पीला है और न ही उस पर नियमानुसार छात्र सुरक्षा के मानक दिखाई देते हैं। आलम यह है कि नियमों में दर्ज ‘पीली बस’ का कॉलेज परिसर में नामोनिशान तक नहीं है।
जब जून माह में टेंडर प्रक्रिया पूरी हुई और बस संचालक के पास पीले रंग की बस उपलब्ध नहीं थी, तब संचालक ने कॉलेज प्रबंधन को लिखित व मौखिक आश्वासन दिया था कि वह आगामी दो महीनों के भीतर पीले रंग की बस उपलब्ध करा देगा।
जून से लेकर अब तक दो महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन आज दिनांक तक अशोकनगर नेहरू महाविद्यालय प्रबंधन को न तो पीले रंग की बस मिली और न ही नियम विरुद्ध चल रही बस पर कोई सख्त कदम उठाया गया। आखिर इतने समय बाद भी ठेकेदार द्वारा शर्तों का पालन न करना और प्रबंधन का इस पर मौन साधे रहना कई तरह के संदेह पैदा करता है।
शासकीय नेहरू महाविद्यालय अशोकनगर प्रबंधन की इस रहस्यमयी खामोशी ने छात्र-छात्राओं और अभिभावकों के बीच आक्रोश और आशंकाएं बढ़ा दी हैं। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर कॉलेज प्रशासन बस संचालक पर इतना मेहरबान क्यों है निविदा की शर्तों का सरेआम उल्लंघन होने के बावजूद बस का ठेका निरस्त क्यों नहीं किया गया या संचालक पर कोई भारी जुर्माना क्यों नहीं लगाया गया क्या इस पूरी प्रक्रिया के पीछे कहीं न कहीं कॉलेज प्रबंधन की संलिप्तता और अंदरूनी साठगांठ है। यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या बस संचालक के साथ मिलकर कॉलेज प्रबंधन अपनी जेबें भरने में लगा है क्या छात्रों के वित्तीय अंशदान और बस सुविधा के नाम पर मिलने वाले फंड में किसी मोटी रकम का लेन-देन हुआ है नियमों की अनदेखी कर बिना मानक वाली बस को हरी झंडी देना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।
इनका कहना है-
वैसे पीले रंग का बस का संचालन होना चाहिए था लेकिन बस संचालक ने दो माह का समय मांगा है, बस का टेंडर जून में हुआ था।
डॉ रेनू राजेश
प्राचार्य, शासकीय नेहरू प्रधानमंत्री कॉलेज अशोकनगर
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खबर 2
आदर्श ग्राम योजना की प्रशासकीय स्वीकृति अटकी आदेशों के बावजूद अधिकारी कर रहे अवहेलना गांवों में विकास कार्य ठप
अशोकनगर। कलेक्टर को सौंपे गए एक शिकायत पत्र के माध्यम से जिले की चारों जनपद पंचायतों अशोकनगर, ईसागढ़, मुंगावली और चंदेरी में ‘प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना’ के तहत चयनित गांवों में प्रशासकीय स्वीकृति न मिलने का गंभीर मामला सामने आया है। शिकायती आवेदन में आरोप लगाया गया है कि केंद्रीय मंत्री श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया और जिला प्रशासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद आदिम जाति कल्याण विभाग के जिला अधिकारी द्वारा आदेशों की निरंतर अवहेलना की जा रही है।
शिकायत के अनुसार, वर्ष 2022-23 में चयनित 12 गांवों (गता सोनेरा, पिपरियाराय, मूडराकलां, धूर्रा, कडेसरा, किरौदा, रांठ, सेमरखेडी, बमुरिया, वरवाह, बीलाखेडा और सेमरखेडी) में प्रति गांव 20 लाख रुपये की कार्ययोजना वर्ष 2024 तक तैयार कराई गई थी। इसमें मनरेगा योजना से 3-3 लाख रुपये का कन्वर्जेंस शामिल कर प्रति गांव 23 लाख रुपये की कुल कार्ययोजना तैयार की गई थी। आवेदन में कहा गया है कि वर्तमान में 01 अप्रैल 2026 से मनरेगा योजना बंद होने का हवाला देकर अधिकारी ग्राम पंचायतों को गुमराह कर रहे हैं और प्रशासकीय स्वीकृति रोक रहे हैं। जबकि जिस समय कार्ययोजनाएं स्वीकृत की गई थीं, उस समय मनरेगा चालू थी। आरोप है कि विभाग द्वारा जानबूझकर 31 मार्च 2026 तक स्वीकृति रोकी गई, जिससे केंद्र सरकार की इस अतिमहत्वपूर्ण योजना के विकास कार्य पूरी तरह अवरुद्ध हो गए हैं।
इसी प्रकार वर्ष 2024-25 में चयनित 30 अन्य गांवों (जिनमें खडीचरा, काकाखेडी, अमाई,कचनार, मढीकानूनगों, ककरूआतूमैन, कबीरा, कूंढईतूमैन, भरका, धतूरिया, बरखेडा फतेहपुर, भेटूआ, धमना, सतउखेडी, कॉलुआ, बावडीखेडा, म्यापुर, सेमराहाट, सेमराबामौरा, खेजराखुर्द, गुपालिया, मलावनी, मलउखेडी, पुराआवाद, दहेला, छीरखेडा, मानकचौक, खासखेडा, गनहारी, सींगाखेडी और देपालखेडी शामिल हैं) को मिलाकर कुल 42 गांवों में विकास कार्य ठप पड़े हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के समक्ष भी इस समस्या को रखा गया था, जिसके बाद कलेक्टर द्वारा संबंधित विभागीय अधिकारी को प्रशासकीय स्वीकृति जारी करने का आदेश दिया गया था। इसके बावजूद अधिकारी बार-बार केंद्रीय मंत्री और जिला प्रशासन के निर्देशों की अनदेखी कर फाइलों को अटका रहे हैं। ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों ने कलेक्टर से तत्काल हस्तक्षेप कर सभी 42 गांवों के लिए प्रशासकीय स्वीकृति जारी कराने की मांग की है।
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