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एपिसोड 1- रांवसर पंचायत में विकास के नाम पर ‘डाका’ बिलों के माध्यम से हुआ पूरा खेल…...
बिलों की आड़ में लिखी गई भ्रष्टाचार की पटकथा सरपंच प्रतिनिधि और सचिव की जुगलबंदी ने पार कीं बेशर्मी की हदें……
अशोकनगर। सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों के नाम पर जनता के खून-पसीने की कमाई को कैसे चूना लगाया जाता है, इसका सबसे घिनौना और प्रत्यक्ष प्रमाण अशोकनगर जनपद की ग्राम पंचायत रांवसर में देखने को मिल रहा है। रांवसर ग्राम पंचायत अब विकास कार्यों के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की नई ‘प्रयोगशाला’ के रूप में पहचान बना चुकी है। यहाँ ग्राम पंचायत के कागजों पर विकास का ऐसा मायाजाल बुना गया है, जिसकी गहराई में जाने पर केवल और केवल वित्तीय अनियमितताओं की बदबू आ रही है। पंचायत की तिजोरी पर डाका डालने के लिए बिलों की ऐसी गढ़ी हुई पटकथा तैयार की गई है, जिसने लोकतंत्र की सबसे प्राथमिक इकाई को लूट का अड्डा बनाकर रख दिया है।
पंचायत व्यवस्था का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि यहाँ चुनी हुई व्यवस्था को किनारे कर समानांतर ‘डमी’ शासन चलाया जा रहा है। ग्राम पंचायत रांवसर में कहने को तो सरपंच कोई और है, लेकिन असल कमान ‘सरपंच प्रतिनिधि’ कहलाने वाले रंजीत यादव और पंचायत सचिव के हाथों में है। इन दोनों की जुगलबंदी ने न केवल सरकारी राशि का बेधड़क गबन किया है, बल्कि मूल सरपंच के संवैधानिक अधिकारों और हक पर भी सरेआम झपट्टा मारा है। जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि को दरकिनार कर रंजीत यादव और सचिव की साठगांठ ने पंचायत में एक ऐसे तंत्र को जन्म दिया है, जिसका एकमात्र मकसद सरकारी धन की बंदरबांट करना है। बिना किसी डर और हिचकिचाहट के, नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए पूरी पंचायत को अपनी निजी जागीर की तरह चलाया जा रहा है।
भ्रष्टाचार की इस पटकथा का सबसे शर्मनाक और पुख्ता सबूत पंचायत भवन में चल रहे निर्माण कार्यों के लिए अपलोड किए गए ऑनलाइन बिलों से मिलता है। बिलों में जिस तरह की बाजीगरी की गई है, वह किसी का भी सिर चकरा दे। ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज आंकड़ों के अनुसार जिसमें 8 मई 2026 का बिल पंचायत भवन निर्माण के नाम पर गिट्टी का एक डंपर 15 हजार रुपए प्रति डंपर के हिसाब से बिल में दिखाया गया। वहीं 10 जुलाई 2026 का बिल जिसमें महज दो महीने बाद, उसी गिट्टी के डंपर की कीमत घटाकर 11 हजार पांच सो रुपए प्रति डंपर दर्ज की गई। सवाल यह उठता है कि क्या मई के महीने में गिट्टी पर कोई सोने का पानी चढ़ा हुआ था जो उसकी कीमत 15 हजार रुपये डंपर पहुंच गई और दो महीने में ही उसके दाम में 3,500 रुपये की गिरावट आ गई या फिर यह सीधा-सीधा कागजी हेरफेर कर सरकारी खजाने को चूना लगाने की नग्न साजिश है यह तो महज एक बानगी है अगर पूरे निर्माण कार्य की बारीकी से ऑडिट की जाए, तो फर्जीवाड़े का ऐसा पहाड़ निकलेगा जिसकी कल्पना भी प्रशासनिक अमले ने नहीं की होगी। यदि इस खुली वित्तीय अनियमितता पर जल्द ही कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो यह न केवल अशोकनगर जिले के प्रशासनिक तंत्र पर एक बदनुमा दाग रहेगा, बल्कि भ्रष्टाचार करने वाले बाकी पंचायतों के प्रतिनिधियों के हौसले भी बुलंद होंगे। अब देखना यह है कि प्रशासन कागजी बाजीगरों पर कब शिकंजा कसता है या फिर यह जांच भी फाइलों के ढेर में कहीं गुम होकर रह जाती है।




