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15 लाख के स्टॉप डैम पर उठे गंभीर सवाल, नींव से लेकर पिलरों तक गुणवत्ता पर संदेह; ग्रामीणों ने मांगी तकनीकी जांच
भौंरा। जनपद पंचायत घोड़ाडोंगरी अंतर्गत ग्राम पंचायत चिखली आमढाना में विशेष निधि से लगभग 15 लाख रुपये की लागत से निर्मित स्टॉप डैम निर्माण शुरू होने के साथ ही विवादों में घिर गया है। निर्माण कार्य की गुणवत्ता को लेकर स्थानीय ग्रामीणों ने गंभीर सवाल उठाते हुए स्वतंत्र तकनीकी जांच और निर्माण सामग्री की लैब टेस्टिंग की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि विभागीय निगरानी प्रभावी नहीं रहने से निर्माण में गुणवत्ता से समझौता किया गया। मौके पर दिखाई दे रही स्थिति को लेकर ग्रामीणों का आरोप है कि स्टॉप डैम की नींव ,बेस में निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप मजबूत सीमेंट कंक्रीट का उपयोग नहीं किया गया। उनका दावा है कि बेस में बजरी प्रधान मिश्रण का उपयोग किया गया, जिससे संरचना की मजबूती प्रभावित होने की आशंका है। ग्रामीणों ने पिलरों के निर्माण पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि जहां पिलरों में ठोस सीमेंट कंक्रीट डाला जाना चाहिए था, वहां अंदर बड़े-बड़े पत्थरों से भराई कर ऊपर से सीमेंट कंक्रीट की परत चढ़ा दी गई। यदि यह आरोप तकनीकी जांच में सही पाए जाते हैं, तो इससे पिलरों की भार वहन क्षमता और पूरे स्टॉप डैम की स्थायित्व क्षमता प्रभावित हो सकती है। निर्माण स्थल पर कंक्रीट के कई हिस्सों में हनीकॉम्बिंग जैसी स्थिति और खाली जगहें भी दिखाई देने का दावा किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि निर्माण में उपयोग की गई रेत की गुणवत्ता भी मानकों के अनुरूप नहीं थी तथा उसमें मिट्टी की मात्रा अधिक होने के साथ गोल कंकड़ों का उपयोग किया गया। उनका कहना है कि ऐसी सामग्री से तैयार कंक्रीट की मजबूती पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। निर्माण क्षेत्र के जानकारों के अनुसार हनीकॉम्बिंग, खाली जगहें और कमजोर कंक्रीट जैसी स्थिति सामान्यतः तब उत्पन्न होती है, जब निर्माण सामग्री का अनुपात निर्धारित मानकों के अनुरूप न हो, पर्याप्त कम्पेक्शन न किया गया हो या गुणवत्ता नियंत्रण की प्रक्रिया का सही ढंग से पालन न किया गया हो। ऐसी स्थिति में केवल स्वतंत्र तकनीकी निरीक्षण और निर्माण सामग्री की प्रयोगशाला जांच ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकती है। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य के दौरान विभागीय निगरानी अपेक्षित स्तर की नहीं रही, जिसके कारण गुणवत्ता नियंत्रण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। उनका कहना है कि यदि समय-समय पर प्रभावी निरीक्षण होता, तो निर्माण के शुरुआती चरण में ही संभावित तकनीकी खामियों को सुधारा जा सकता था। सूत्रों के अनुसार लगभग 15 लाख रुपये की स्वीकृत राशि में से कुछ भुगतान भी किया जा चुका है। इसे लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं कि गुणवत्ता का तकनीकी परीक्षण और वैल्यूएशन पूरा होने से पहले भुगतान किस आधार पर किया गया।
ग्रामीणों ने मांग की है कि पूरे निर्माण कार्य की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए, पिलरों और नींव की गुणवत्ता की विशेषज्ञों से जांच हो, निर्माण सामग्री के नमूनों की लैब टेस्टिंग कराई जाए तथा जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि निर्माण कार्य निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप हुआ है या नहीं।





