खबरवाणी
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों का सफर
पुनरावलोकन व आत्मावलोकन
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष ‘जो बात छिपाई जाए उसे बताना ही पत्रकारिता है’ – पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर
नरसिंहपुर। हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली 200 वर्षों के इतिहास पर चर्चा करने और भविष्य की चुनौतियों का आत्म-मंथन करने के उद्देश्य से आज शगुन मैरिज गार्डन में एक गरिमामयी कार्यक्रम हुआ। “हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पुनरावलोकन एवं आत्मावलोकन” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर निदेशक, माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल उपस्थित रहे।
शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन कर, पत्रकारिता के पुरोधा श्री गणेश शंकर विद्यार्थी जी के चित्र पर माल्यार्पण कर हुई। इसमें नगर पालिका अध्यक्ष नीरज महाराज, भाजपा नेता महंत प्रीतम पुरी गोस्वामी, इंजी सुनील कोठारी, कांग्रेस नेता डाॅ संजीव चांदोरकर, अधिवक्ता संघ के सचिव सुलभ जैन, साहित्यकार अजय तुलसी, एड प्रवीण शर्मा,संजय जैन भी शामिल रहे। कार्यक्रम का संचालन आयोजन के सूत्रधार सुशान्त पुरोहित ने किया।
पत्रकार संवाद केन्द्र के बैनर तले हुए कार्यक्रम के दौरान श्री श्रीधर ने पत्रकारिता के उद्भव से लेकर वर्तमान स्वरूप तक के सफर को बड़ी बारीकी से उपस्थितजनों के समक्ष साझा किया। इस मौके पर उन्होंने पत्रकारिता के पुरखों को आदरांजलि देते हुए उनके योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने ने कहा कि जो बात छुपाई जाए, उसे बताया जाए वह पत्रकारिता है और जो बात सच न होते हुए भी बताया जाए वह प्रचार है।
पत्रकारिता पेशा नहीं राष्ट्र निर्माण का माध्यम
पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर ने अपने संबोधन में कहा कि हिंदी पत्रकारिता का इतिहास केवल सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम और सामाजिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि 1826 में उदन्त मार्तण्ड के प्रकाशन के साथ शुरू हुआ। यह सफर आज डिजिटल युग तक पहुँच चुका है। उन्होंने वर्तमान दौर में पत्रकारिता के गिरते मूल्यों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज पत्रकारों को स्वयं के भीतर आत्मावलोकन की आवश्यकता है ताकि विश्वसनीयता बनी रहे। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा स्व. माधवराव सप्रे के योगदान को याद करते हुए बताया कि कैसे सीमित संसाधनों में भी भाषाई मर्यादा और राष्ट्रीयहितों को सर्वोपरि रखा गया। आज हिंदी समाचारों में अंग्रेजी के शब्दों का चलन बढ़ा है जो हिंदी के लिये खतरा है। श्रीधर जी ने इस मौके पर अपनी जन्मस्थली बोहानी को प्रणाम किया और कहा कि मैं आज जो कुछ भी हूँ अपनी मातृभूमि और गुरुजनों, माता-पिता की बदौलत हूँ। आप जहाँ भी रहें विन्रम बने रहें, प्रतिद्वंदता न रखें, किसी से ईर्ष्या भाव न रखें, इंसानियत को सर्वोपरि रखें। हम बच्चों को भी अच्छे गुण सिखाएं उन्हें रोबोट न बनाएं, बच्चे सभी भाषाओं का ज्ञान लें पर अपनी मातृभाषा को विस्मृत न करें, हम जब एक साथ हों तो अपनी स्थानीय भाषा में बात करें और यही हमारी पहचान है।
कार्यक्रम की मुख्य बातें
इस संगोष्ठी में शहर के गणमान्य नागरिकों और पत्रकार जगत की हस्तियों ने शिरकत की। कार्यक्रम के दौरान श्रीधर जी ने भारत में पत्रकारिता के ऐतिहासिक संदर्भ में प्रेस की स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष की गाथा, हिंदी के स्वरूप और समाचार पत्रों में उसकी शुद्धता बनाए रखने की चुनौती व सोशल मीडिया और फेक न्यूज के दौर में मुख्यधारा की पत्रकारिता की जिम्मेदारी सहित, सामाजिक सरोकार पत्रकारिता का समाज के प्रति दायित्व और वंचितोंच की आवाज बनना जैसे विषयों पर अपनी बात रखी।
बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों की सहभागिता
संगोष्ठी में उपस्थित बुद्धिजीवियों ने श्री श्रीधर से इतिहास और शोध पर आधारित कई जानकारियां भी दीं। समाजसेवियों ने इस बात पर जोर दिया कि पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी निष्पक्षता को हर हाल में सुरक्षित रखना चाहिए। स्थानीय पत्रकारों के लिए यह सत्र काफी ज्ञानवर्धक रहा, जहाँ उन्हें समाचार पत्र उनके संग्रह के महत्व और पुराने दस्तावेजों के संरक्षण की बारीकियों को समझने का अवसर मिला।
पत्रकारिता में तकनीक बदल सकती है, माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन पत्रकारिता की आत्मा ‘सत्य’ कभी नहीं बदलनी चाहिए।
-विजय दत्त श्रीधर जी
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भारतीय पत्रकारिता और साहित्य के दो स्तंभ
पंडित माखनलाल चतुर्वेदी और माधवराव सप्रे भारतीय पत्रकारिता और साहित्य के वे दो स्तंभ हैं, जिन्होंने न केवल हिंदी भाषा को समृद्ध किया, बल्कि अपनी लेखनी को स्वतंत्रता संग्राम का अस्त्र बनाया। इन दोनों विभूतियों का संबंध गुरु-शिष्य जैसा था और दोनों ने मध्य प्रदेश की धरती से राष्ट्रीय चेतना को स्वर दिया। सप्रे जी ने उस समय हिंदी का झंडा बुलंद किया जब संसाधनों का घोर अभाव था। सन 1900 में उन्होंने छत्तीसगढ़ मित्र नामक पत्रिका निकालकर हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी। उन्होंने मराठी भाषी होते हुए भी हिंदी की सेवा की और विदेशी शब्दों के स्थान पर सटीक हिंदी शब्दावली के प्रयोग पर बल दिया। सप्रे जी ने लोकमान्य तिलक के गीता रहस्य का हिंदी अनुवाद किया, जिससे हिंदी भाषी क्षेत्रों में क्रांतिकारी विचारों का प्रसार हुआ। उनकी कहानी एक टोकरी भर मिट्टी को हिंदी की पहली मौलिक कहानी होने का गौरव प्राप्त है। वहीं माखनलाल जी, सप्रे जी के मानस पुत्र और शिष्य थे। उन्होंने कविता और पत्रकारिता के माध्यम से सोए हुए राष्ट्र को जगाने का कार्य किया। सप्रे जी के मार्गदर्शन में उन्होंने प्रभा और बाद में कर्मवीर का संपादन संभाला। कर्मवीर उस दौर में निर्भीक पत्रकारिता का पर्याय बन गया था। उनकी पुष्प की अभिलाषा कविता आज भी राष्ट्रभक्ति का सर्वोच्च शिखर मानी जाती है, जहाँ एक फूल सम्राटों के शव पर नहीं, बल्कि शहीदों के मार्ग पर बिछने की इच्छा व्यक्त करता है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वे कई बार जेल गए, लेकिन उनकी कलम कभी नहीं रुकी। उन्हें उनके काव्य संग्रह हिम तरंगिणी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अंत में आभार व्यक्त बृजेश शर्मा ने किया।





