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द्वापर युग के महानायक भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य प्राकट्य
महामण्डलेश्वर स्वामी अखिलेश्वरानन्द गिरि
मथुरा। द्वापर युग के महानायक भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य भारतीय सनातन परंपरा की सबसे महत्वपूर्ण और दिव्य घटनाओं में से एक माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन धर्म, नीति, प्रेम, परमार्थ और लोककल्याण का संदेश देता है। उनके प्राकट्य से लेकर बाल, किशोर और प्रौढ़ अवस्था तक की लीलाएँ भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना को निरंतर प्रेरित करती रही हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य की कथा उनके जन्म से पहले ही प्रारंभ हो जाती है। मथुरा के तत्कालीन शासक कंस अपनी चचेरी बहन देवकी के विवाह के बाद उन्हें और उनके पति वसुदेव को विदा कर रहा था। उसी समय आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवाँ पुत्र कंस का वध करेगा। यह सुनकर कंस ने देवकी का वध करने के लिए तलवार उठा ली। तब वसुदेव ने अपनी शालीनता, सत्यनिष्ठा और विनम्रता का परिचय देते हुए कंस को आश्वासन दिया कि देवकी से जन्म लेने वाली आठवीं संतान को वह स्वयं उसके हवाले कर देंगे।
कंस ने तत्काल देवकी को तो छोड़ दिया, लेकिन बाद में भय और क्रूरता के कारण देवकी और वसुदेव को कारागार में बंदी बना लिया। देवकी के क्रमशः छह पुत्र हुए, जिन्हें कंस ने निर्दयतापूर्वक मृत्यु के घाट उतार दिया। सातवें गर्भ की लीला के बाद जब आठवें गर्भ में भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ, तब कारागार में अद्भुत और दिव्य घटनाएँ घटित हुईं।
मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने माता-पिता को चतुर्भुज स्वरूप में दर्शन दिए और वसुदेव जी को निर्देश दिया कि वे उन्हें गोकुल में नंद बाबा के घर पहुँचा दें। वहाँ यशोदा मैया के यहाँ जन्मी कन्या को वे वापस मथुरा के कारागार में ले आएँ। भगवान की लीला के अनुरूप वसुदेव जी श्रीकृष्ण को लेकर गोकुल पहुँचे और उन्हें नंद बाबा के यहाँ छोड़कर कन्या को अपने साथ कारागार में ले आए।
कंस को जब कन्या के जन्म का समाचार मिला तो उसने उसका वध करना चाहा। किंतु वह कन्या उसके हाथ से छूटकर दिव्य तेजस्वी स्वरूप में आकाश में प्रकट हुई और उसने कंस को चेतावनी दी कि उसका वध करने वाला जन्म ले चुका है और गोकुल पहुँच चुका है। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य की कथा दिव्य और चमत्कारिक घटनाओं से परिपूर्ण है।
भगवान श्रीकृष्ण का आगे का जीवन भी अनेक लीलाओं और आदर्शों से भरा रहा। पूतना वध सहित उनकी बाल लीलाएँ भक्तों के मन को मोह लेती हैं। उनका किशोर जीवन प्रेम और माधुर्य का प्रतीक है, वहीं प्रौढ़ जीवन नीति, धर्म और लोककल्याण का संदेश देता है।
महाभारत के प्रसंग में श्रीकृष्ण ने कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध रोकने के लिए अंतिम क्षण तक प्रयास किया। किंतु जब युद्ध अपरिहार्य हुआ तो उन्होंने धर्म की स्थापना के लिए अर्जुन का सारथी बनकर श्रीमद्भगवद्गीता का अमर संदेश दिया। उनका जीवन राग-द्वेष से परे रहते हुए कर्तव्य और धर्म के पालन का सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करता है।
श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं के संदर्भ में स्वजन मोहिनी, सज्जन मोहिनी और दुर्जन मोहिनी माया के साथ स्वमोहिनी माया का भी उल्लेख मिलता है। स्वमोहिनी माया के माध्यम से सर्वसमर्थ भगवान स्वयं को सामान्य जन के बीच सहज रूप में स्थापित करते हैं। यही उनकी लीला की अद्भुत विशेषता है।
भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि धर्म, प्रेम, नीति, कर्म और लोककल्याण के शाश्वत संदेश का प्रतीक है। उनका जीवन आज भी मानव समाज को सत्य के मार्ग पर चलने, कर्तव्य का पालन करने और धर्म की स्थापना के लिए प्रेरित करता है।
— विनयावनत
महामण्डलेश्वर स्वामी अखिलेश्वरानन्द गिरि





