MP Politics | बैतूल नहीं अन्य लोकसभा सीट होती आरक्षित

हरसूद को बैतूल सीट से जोडऩे का हुआ था राजनैतिक षडय़ंत्र

MP Politics – बैतूल – अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए बड़े नेता दूसरे क्षेत्र का राजनैतिक नुकसान करने में झिझकते नहीं है। ऐसी ही स्थिति बैतूल लोकसभा सीट के साथ हुई थी। यदि दुर्भावनावश बैतूल को आरक्षित करने का प्रयास नहीं किया जाता तो बैतूल लोकसभा सीट आज भी अनारक्षित वर्ग के लिए रहती। और बगल की लोकसभा सीट आरक्षित होती ऐसी राजनैतिक हल्को में चर्चा आम है।

    आज हम इसी कथित षड्यंत्र पर विस्तृत विवरण देने का प्रयास कर रहे हैं जो हमें विभिन्न राजनेताओं और राजनैतिक समीक्षकों से बात करने के बाद ज्ञात हुआ है। 

ऐसे हुई बैतूल सीट आरक्षित | MP Politics

1952 से 2008 तक बैतूल संसदीय सीट अनारक्षित रही। और 2008 का अनारक्षित वर्ग के लिए आखरी चुनाव उपचुनाव के रूप में हुआ था। 2008 में ही बैतूल सीट आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हो गई थी। राजनैतिक हल्को में इसके पीछे की कहानी यह बताई जाती है कि उस समय बैतूल की जगह छिंदवाड़ा लोकसभा सीट आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित होती ,क्योंकि वहां पर बैतूल-हरदा संसदीय सीट की तुलना में आदिवासी वर्ग के मतदाताओं की संख्या ज्यादा थी। बताया तो यह भी जाता है कि षडय़ंत्र के तहत बैतूल लोकसभा सीट को आरक्षित करने के लिए चाल चली गई और खण्डवा जिले की आरक्षित विधानसभा सीट हरसूद को यहां जोड़ा गया ताकि छिंदवाड़ा की तुलना में बैतूल लोकसभा सीट में आरक्षित मतदाता की संख्या बढ़ जाए और ऐसा ही हुआ।

जानकारी यह भी है कि परिसीमन आयोग ने ऐसी स्थिति में बैतूल को आरक्षित एवं छिंदवाड़ा को अनारक्षित कर दिया। इसका सीधा फायदा कांग्रेस के बड़े नेता कमलनाथ और उनके परिवार को मिला। वहीं बैतूल से निरंतर 1996 से 5 लोकसभा चुनाव जीत चुके विजय कुमार खण्डेलवाल और उनके पुत्र हेमंत खण्डेलवाल को संसदीय चुनावी यात्रा से दूर होना पड़ा।

हरसूद जुडऩे से 4 विधानसभा सीटें हुई आरक्षित

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2008 तक बैतूल-हरदा संसदीय सीट में 8 विधानसभा सीटें थी जिनमें मात्र बैतूल जिले की भैंसदेही और घोड़ाडोंगरी आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित थी। वहीं आमला और टिमरनी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थीं। इसके विपरित बैतूल, मुलताई, मासोद और हरदा विधानसभा सीट अनारक्षित थी। वहीं परिसीमन के दौरान खण्डवा जिले की अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हरसूद विधानसभा को बैतूल लोकसभा सीट में जोडऩे से बैतूल में आदिवासी वर्ग के लिए चार विधानसभा सीट हो गई। जिनमें घोड़ाडोंगरी, भैंसदेही, हरसूद एवं टिमरनी(नए परिसीमन के बाद एससी से एसटी वर्ग के लिए आरक्षित) हुई। एवं सामान्य सीट मासोद समाप्त हो गई थी।

छिंदवाड़ा में शुरू से ही तीन सीटें आरक्षित | MP Politics
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छिंदवाड़ा संसदीय सीट मध्यप्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से परिसीमन के पहले और परिसीमन के बाद आज भी ऐसी दो सीटों में से एक सीट है, जिनमें मात्र 7 विधानसभाएं शामिल हैं। एवं बैतूल सहित मध्य प्रदेश की अन्य 27 लोकसभा सीटों में आठ विधानसभा सीटें शामिल है। यदि बैतूल में हरसूद नहीं जुड़ता और छिंदवाड़ा में सिवनी जिले की कोई सीट जोड़ी जाती तो छिंदवाड़ा आरक्षित सीट होती और बैतूल अनारक्षित। ऐसी ही स्थिति में कमलनाथ और उनके परिवार को चुनाव लडऩे के लिए नया लोकसभा क्षेत्र ढूंढना पड़ता। गौरतलब है कि छिंदवाड़ा लोकसभा सीट की 7 विधानसभाओं में से पांढुर्णा, अमरवाड़ा और जुन्नारदेव आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित है।

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