खबरवाणी
कागजों पर ‘सरपंच’ घासीराम, तिजोरी पर सरपंच प्रतिनिधि रंजीत यादव का ‘कब्जा’….
रांवसर ग्राम पंचायत में फर्जी हस्ताक्षरों से सरकारी खजाने में भीषण सेंधमारी क्या जनपद सीईओ सरपंच प्रतिनिधि पर करा पाएंगे FIR …..?
खबरवाणी सुशील कुशवाह अशोकनगर । जनपद पंचायत अशोकनगर के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत रांवसर इस समय भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अराजकता का एक ऐसा टापू बन चुकी है, जहाँ लोकतंत्र का सरेआम गला घोंटा जा रहा है। कागजों में और जनता के मतों से चुने गए मूल सरपंच घासीराम कोरी को सिर्फ एक प्रशासनिक मोहरा और ‘कठपुतली’ बनाकर रख दिया गया है, जबकि सत्ता की असली चाबी और पंचायत के खजाने का रिमोट कंट्रोल ‘सरपंच प्रतिनिधि’ रंजीत यादव के हाथों में है। हाल ही में ‘खबर वाणी’ समाचार पत्र द्वारा की गई एक जमीनी और निष्पक्ष पड़ताल ने रांवसर ग्राम पंचायत में चल रहे इस फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ किया है। पड़ताल के दौरान जो तथ्य, दस्तावेज और साक्ष्य निकलकर सामने आए हैं, वे न केवल हैरान करने वाले हैं बल्कि इस बात की ओर भी स्पष्ट इशारा करते हैं कि रांवसर में सरकारी राशि को फर्जी बिलों, फर्जी दस्तावेजों और सबसे संगीन फर्जी हस्ताक्षरों के बल पर ठिकाने लगाया जा रहा है।
‘खबर वाणी’ की खोजी टीम जब रांवसर पंचायत के सरकारी भुगतानों और आवेदनों के पन्नों तक पहुँची, तो फर्जीवाड़े का एक सुनियोजित खेल बेनकाब हुआ। पंचायत के आधिकारिक आवेदनों और निकासी संबंधी प्रपत्रों पर दर्ज सरपंच घासीराम कोरी के हस्ताक्षरों का जब मिलान किया गया, तो वे एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न और संदेहास्पद पाए गए। एक ही व्यक्ति द्वारा अलग-अलग दस्तावेजों पर पूरी तरह बदल जाने वाले यह हस्ताक्षर इस बात का पुख्ता सबूत हैं कि सरपंच की गैर-मौजूदगी या उनकी अज्ञानता का फायदा उठाकर रंजीत यादव खुद ही सरपंच के दस्तखत बना रहे हैं। यह महज एक साधारण अनियमितता नहीं है, बल्कि सरकारी तंत्र के साथ की गई एक खुली धोखाधड़ी है। क्या निर्वाचित सरपंच घासीराम कोरी को यह भी भनक है कि उनके नाम पर किन-किन कागजों पर अंगूठे या दस्तखत चिपकाए जा रहे हैं या फिर एक दलित वर्ग से आने वाले सरपंच की लाचारी का फायदा उठाकर रंजीत यादव खुद ही राजा और खुद ही काजी बने बैठे हैं।
फर्जी दस्तखत और कूटरचित दस्तावेजों का यह खेल रंजीत यादव को आने वाले दिनों में बहुत भारी पड़ने वाला है। कानून की नजर में यह कोई सामान्य प्रशासनिक लापरवाही नहीं है। सरकारी खजाने से किसी दूसरे व्यक्ति या अधिकारी के फर्जी दस्तखत बनाकर राशि का आहरण करना सीधा-सीधा भारतीय न्याय संहिता की संगीन धाराओं के तहत ‘जालसाजी सरकारी पैसे की गबन’ और ‘अपराधिक षड्यंत्र का मामला बनता है। यदि इस मामले की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच होती है, तो यह फर्जीवाड़ा रंजीत यादव को सीधे सलाखों के पीछे पहुँचाने के लिए काफी है। कानून के हाथ भले ही देर से पहुँचें, लेकिन जब पहुँचते हैं तो किसी भी ‘कथित प्रतिनिधि’ का रसूख काम नहीं आता। जालसाजी की नींव पर खड़ी की गई यह काली कमाई जल्द ही कानूनी शिकंजे में बदलने वाली है। जब इस संबंध में जनपद पंचायत अशोकनगर के सीईओ शैलेंद्र यादव से बात करने का प्रयास किया तो उन्होंने कॉल नहीं उठाया। और उसके बाद फोन बंद कर लिया।





