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नियमों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से चल रहा ‘ब्राइट बिगनिंग स्कूल’ डीपीसी कार्यालय में बैठे परिजनों के दम पर अफसर मेहरबान…..?

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खबरवाणी

नियमों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से चल रहा ‘ब्राइट बिगनिंग स्कूल’ डीपीसी कार्यालय में बैठे परिजनों के दम पर अफसर मेहरबान…..?

अधिकारियों की नाक के नीचे चल रहा नियम-विरुद्ध खेल सवाल आखिर अब कार्रवाई की उम्मीद किससे करें……

अशोक नगर। शिक्षा महकमे में अनियमितताओं और मनमानी का खेल नया नहीं है, लेकिन जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाएं, तो व्यवस्था से भरोसा उठना स्वाभाविक है। ताजा मामला ‘ब्राइट बिगनिंग स्कूल’ का है, जो तमाम विभागीय नियमों और मापदंडों को दरकिनार कर खुलेआम संचालित हो रहा है। हैरानी की बात यह नहीं है कि स्कूल प्रबंधन नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है; हैरान करने वाला पहलू यह है कि इस मनमानी के पीछे डीपीसी कार्यालय की ओट छिपी हुई है। विश्वस्त सूत्रों की मानें तो स्कूल संचालक के करीबी परिजन डीपीसी कार्यालय में ही पदस्थ हैं। अब सवाल यह उठता है कि जिस कार्यालय के कंधों पर जिले भर के निजी और सरकारी स्कूलों में नियमों का पालन कराने, आरटीई की पारदर्शिता बनाए रखने और व्यवस्था को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी है, वही कार्यालय यदि अपने चहेतों को संरक्षण देने लगे, तो निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

शिक्षा विभाग के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि बिना वैध मान्यता, अग्निशमन सुरक्षा प्रमाण पत्र, सुरक्षित भवन, और पर्याप्त खेल मैदान के कोई भी शिक्षण संस्थान संचालित नहीं हो सकता। लेकिन ‘ब्राइड बिगनिंग स्कूल’ के मामले में यह तमाम नियम केवल फाइलों की शोभा बढ़ा रहे हैं। क्या स्कूल परिसर में बच्चों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं अग्निशमन यंत्रों से लेकर भवन की एनओसी तक, हर मोर्चे पर स्थिति संदिग्ध बनी हुई है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे गंभीर बिंदु ‘हितों का टकराव’ का है। जब किसी स्कूल के संचालक का सीधा पारिवारिक संबंध उस कार्यालय के अधिकारियों या कर्मचारियों से हो, जो उस स्कूल की जांच और निगरानी के लिए अधिकृत है, तो फिर निष्पक्ष कार्रवाई की गुंजाइश कहां बचती है डीपीसी कार्यालय में बैठे परिजन अपनी कुर्सी और रसूख का इस्तेमाल कर न केवल स्कूल के खिलाफ आने वाली शिकायतों को ठंडे बस्ते में डाल रहे हैं, बल्कि किसी भी तरह की संभावित जांच से पहले ही प्रबंधन को सतर्क कर देते हैं। विभागीय फाइलों को दबाना, निरीक्षण की तिथियों में हेरफेर करना और वरिष्ठ अधिकारियों को गुमराह करना यह सब एक सोचे-समझे तंत्र का हिस्सा बन चुका है। यदि इस बार भी कागजी खानापूर्ति कर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की गई, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि शिक्षा विभाग में नियम केवल आम जनता के लिए हैं, जबकि रसूखदारों के लिए पूरी व्यवस्था ही बिछी हुई है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस ‘गठजोड़’ पर बुलडोजर चलाता है या मौन स्वीकृति देकर इस धांधली का हिस्सेदार बना रहता है।

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