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शिक्षक के प्रति समाज का बदलता दृष्टिकोण राष्ट्र के भविष्य के लिए घातक संकेत
आज के बदलते दौर में विकास की नई ऊंचाइयों को छूने की बातें हो रही हैं, लेकिन समाज की नींव मजबूत करने वाले शिक्षक के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता में लगातार कमी चिंता का विषय है। यह विडंबना ही है कि दूसरों के जीवन को संवारने में अपना पूरा जीवन लगा देने वाला शिक्षक आज स्वयं उपेक्षा और अव्यवस्था का सामना करता दिखाई देता है। ज्ञान की मशाल लेकर बच्चों के भविष्य को दिशा देने वाले इस वर्ग को केवल आदेशों और गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों तक सीमित कर देना शिक्षा व्यवस्था के साथ अन्याय है।
शिक्षक की भूमिका एक माली की तरह होती है। जिस प्रकार माली एक छोटे से बीज को पौधे में बदलता है, उसे धूप, हवा और प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाता है और निरंतर सींचकर उसे वृक्ष का रूप देता है, उसी प्रकार शिक्षक भी बच्चे के व्यक्तित्व को ज्ञान, संस्कार और अनुशासन से सींचता है। वह केवल पढ़ना-लिखना नहीं सिखाता, बल्कि सही और गलत के बीच अंतर समझने, निर्णय लेने और जिम्मेदार नागरिक बनने की क्षमता विकसित करता है।
विडंबना यह है कि जब यही बच्चा बड़ा होकर सफलता हासिल करता है तो समाज उसकी उपलब्धि का श्रेय उसकी प्रतिभा, परिवार और परिस्थितियों को तो देता है, लेकिन उस शिक्षक के योगदान को अक्सर भुला देता है, जिसने उसके व्यक्तित्व की नींव तैयार की थी। सफलता का वृक्ष दिखाई देता है, लेकिन उसे सींचने वाला माली नजरअंदाज हो जाता है।
शिक्षक समाज में मनुष्यता और जिम्मेदारी के संस्कार पैदा करने वाला निर्माता है। माता-पिता बच्चे को जीवन देते हैं और शिक्षक उस जीवन को दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य करता है। इसलिए बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में परिवार और शिक्षक की भूमिका एक-दूसरे की पूरक है।
आज शिक्षक से शिक्षण के अलावा अनेक गैर-शैक्षणिक कार्यों की अपेक्षा की जाती है। लगातार बढ़ते प्रशासनिक दायित्व, कागजी कार्यवाही और विभिन्न अभियानों की जिम्मेदारियां उसके मूल कार्यबच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने से उसका ध्यान भटकाती हैं। इससे प्रभावित केवल शिक्षक नहीं होता, बल्कि उसका सीधा असर विद्यार्थियों और शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है।
समाज को यह समझना होगा कि शिक्षक का सम्मान शिक्षक दिवस पर पुष्पगुच्छ भेंट करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। शिक्षक को सम्मानजनक कार्य वातावरण, सामाजिक गरिमा और अपने मूल दायित्व के निर्वहन के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता देना भी उतना ही आवश्यक है।
शिक्षक का अपमान वास्तव में उस व्यवस्था का अपमान है, जिसके माध्यम से हम आने वाली पीढ़ियों का निर्माण करते हैं। यदि हम मजबूत, शिक्षित और संस्कारवान समाज की कल्पना करते हैं तो शिक्षक को उसका उचित सम्मान और गरिमा लौटानी होगी। क्योंकि जिस समाज में शिक्षक की प्रतिष्ठा घटती है, वहां आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की नींव भी कमजोर होने लगती है।





