Sakat Chauth Ki Kahani: सकट चौथ का व्रत भगवान गणेश, सकट माता और चंद्र देव को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा, व्रत और कथा पढ़ने या सुनने से जीवन के बड़े से बड़े संकट भी कट जाते हैं। खासतौर पर सकट चौथ की ननद-भाभी की कथा बहुत प्रसिद्ध है, जिसे पढ़े बिना व्रत अधूरा माना जाता है। आइए जानते हैं इस व्रत का महत्व और पूरी कथा, आसान देसी हिंदी में।
सकट चौथ व्रत का धार्मिक महत्व
सकट चौथ माघ महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है। इस दिन महिलाएं संतान सुख, परिवार की खुशहाली और दुख-दरिद्रता से मुक्ति के लिए निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं। मान्यता है कि भगवान गणेश इस दिन सच्चे मन से व्रत रखने वालों की हर मनोकामना पूरी करते हैं और जीवन के संकट हर लेते हैं।
दो भाइयों और ननद-भाभी की शुरुआत
प्राचीन समय की बात है, एक गांव में दो सगे भाई रहते थे। बड़ा भाई बहुत धनवान था, जबकि छोटा भाई गरीब था और लकड़ियां बेचकर गुजारा करता था। छोटे भाई की पत्नी भगवान गणेश की सच्ची भक्त थी और हर संकष्टी चतुर्थी का व्रत करती थी। एक साल सकट चौथ पर उसके पास पूजा के लिए प्रसाद तक के पैसे नहीं थे।
गणेश जी की लीला और सच्ची भक्ति का फल
गरीब बहू ने बड़ी भाभी के घर काम किया, लेकिन उसे मेहनताना नहीं मिला। दुखी होकर वह घर लौटी और गणेश जी के आगे रोने लगी। उसी रात भगवान गणेश साधु का रूप धरकर उसके घर आए। बहू ने बची हुई भाजी खिलाई और अपनी भूखी हालत में भी अतिथि का आदर किया। उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उसे अपार धन का वरदान दिया।
लालच का फल और बड़ी भाभी की परीक्षा
अगले दिन बहू के घर सोना ही सोना हो गया। यह देखकर बड़ी भाभी के मन में लालच आ गया। उसने भी वही सब करने की कोशिश की, लेकिन उसके घर धन की जगह गंदगी और बदबू फैल गई। चाहे जितनी सफाई की, बदबू दूर नहीं हुई। तब पंडितों ने कहा कि उसे अपनी गलती सुधारनी होगी और छोटे भाई की बहू का हक लौटाना होगा।
सकट चौथ व्रत से मिली सीख
जब बड़ी भाभी ने अपनी गलती मानकर गहने लौटाए और मन से पश्चाताप किया, तब उसके घर से बदबू दूर हुई। तभी से यह मान्यता चली कि सकट चौथ का व्रत सच्चे मन, सेवा और बिना लालच के करना चाहिए। जो लोग ईमानदारी और श्रद्धा से गणेश जी की पूजा करते हैं, उनके सारे दुख दूर हो जाते हैं।





