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विजयपुर में शव वाहन की व्यवस्था नहीं, पोस्टमार्टम के बाद मिलता है जवाब खुद कर लो व्यवस्था

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श्योपुर: मध्य प्रदेश में विकास के लाख दावे उस जगह आकर फेल हो जाते हैं जहां मरने के बाद भी एक ग्रामीण के शव को उसके घर तक पहुंचाने के लिए शव वाहन तक नहीं मिलता. परिजन राह ताकते रहें लेकिन व्यवस्था की कोई उम्मीद नहीं लगती. जी हां ठीक ऐसी ही तस्वीर प्रदेश के श्योपुर से निकल कर आई है. एक बुजुर्ग जिसने इलाज के दौरान सरकारी अस्पताल में दम तोड़ दिया लेकिन उसके शव को घर तक पहुंचाने के लिए शव वाहन तक नहीं मिला.

एक्सीडेंट में हुई थी महिला की मौत

असल में मामला श्योपुर के विजयपुर क्षेत्र का है, वही विजयपुर जहां लगभग 30 सालों तक रामनिवास रावत विधायक रहे. बीजेपी सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बने लेकिन उस विधानसभा के मुख्यालय विजयपुर में शव वाहन की व्यवस्था नहीं है. ये बात तब एक बार फिर अखरी जब शुक्रवार को विजयपुर के इकलौद रोड पर 2 मोटर साइकिल की भिड़ंत हो गई. इस हादसे में दो मासूम बच्चों समेत कुल 5 लोग घायल हुए थे, एक तरह से सामान्य सड़क दुर्घटना थी. लेकिन इलाज के दौरान हादसे का शिकार हुई 60 वर्षीय बुजुर्ग महिला भग्गो बाई की मौत हो गई.

अस्पताल कर्मचारियों ने कहा खुद करो इंतजाम

मौत के बाद भग्गो बाई के शव का पोस्टमार्टम भी विजयपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में ही किया गया. पोस्टमार्टम के बाद जब परिजन को शव सौंपा गया तो वाहन शव ले जाने के लिए शव वाहन नहीं था. जब पीड़ित परिवार के लोगों ने अस्पताल प्रबंधन से शव वाहन उपलब्ध कराने को कहा तो अस्पताल के कर्मचारियों ने उन्हें खुद इंतजाम करने की बात कह दी.

ट्रैक्टर ट्रॉली से शव घर ले जाने मजबूर हुए ग्रामीण

इन हालातों में ग्रामीण काफी देर तक परेशान होते रहे. आखिर में एक निजी ट्रैक्टर ट्रॉली बुलवाई गई और मजबूरन ग्रामीण उसमें शव रख कर गांव के लिए रवाना हुए. ये ऐसी घटना थी जिसने मानवीय पहलुओं पर एक बार फिर शासन के दावों की कलई खोल दी.

 

कई बार कलेक्टर से की गई शव वाहन की मांग

स्थानीय बीजेपी नेता सौरभ जादौन तो इस समस्या को लेकर श्योपुर कलेक्टर को कई बार पत्राचार भी कर चुके हैं. बीजेपी नेता का कहना है कि "वे कई बार कलेक्टर को लिखित में शव वाहन ना होने की जानकारी और मांग रख चुके हैं लेकिन आज तक किसी तरह की सुनवाई नहीं हुई है.

ये विजयपुर में बहुत आम हो चुका है कि, लोग अस्पताल में आते हैं इलाज कराते हैं और यदि किसी की मौत हो जाती है तो उसके लिए शव वाहन होता ही नहीं है. पीड़ित परिवारों को खुद शव ले जाने की व्यवस्था करनी पड़ती है. जिसकी वजह से उन्हें मानसिक और आर्थिक दोनों ही परेशानियों से गुज़रना पड़ता है." हालांकि इस बारे में जानने के लिए हमने श्योपुर कलेक्टर अर्पित वर्मा से संपर्क का भी प्रयास किया लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका.

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