हिंदू विवाह में वरमाला का पल सबसे रोमांचक और यादगार माना जाता है। शादी के इस शुभ अवसर पर जब दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे को फूलों की माला पहनाते हैं, तो यह सिर्फ एक रस्म नहीं बल्कि एक पवित्र वचन का प्रतीक होता है। लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि पहले माला कौन पहनाता है — दूल्हा या दुल्हन? आइए जानते हैं इस परंपरा की शुरुआत, इसका धार्मिक महत्व और इसके पीछे की कहानी।
वरमाला की शुरुआत कहां से हुई
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्री देवी सती के विवाह के लिए एक स्वयंवर आयोजित किया था। इस स्वयंवर में सती ने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर भगवान शिव को माला पहनाई और उन्हें अपना पति चुना। कहा जाता है कि इसी घटना से वरमाला की परंपरा की शुरुआत हुई। तब से विवाह में दुल्हन द्वारा दूल्हे को माला पहनाना प्रेम और स्वीकृति का प्रतीक माना जाता है।
शादी में वरमाला का प्रतीकात्मक अर्थ
हिंदू संस्कृति में विवाह को सोलह संस्कारों में सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। वरमाला का यह पल सिर्फ एक रस्म नहीं बल्कि स्वीकृति, आदर और नए जीवन की शुरुआत का संकेत होता है। इस दिन दूल्हा और दुल्हन को भगवान शिव और माता पार्वती के स्वरूप में देखा जाता है। माला पहनाना यह दर्शाता है कि दोनों एक-दूसरे को जीवन साथी के रूप में स्वीकार कर रहे हैं।
पहले दुल्हन पहनाती है माला, फिर दूल्हा
धार्मिक दृष्टि से देखा जाए तो अधिकांश शास्त्रों और लोक परंपराओं में माना गया है कि पहले दुल्हन दूल्हे को वरमाला पहनाती है। यह उसकी स्वीकृति और प्रेम का प्रतीक है। इसके बाद दूल्हा भी दुल्हन को माला पहनाता है, जो इस रिश्ते के पूर्ण स्वीकार का संकेत होता है। यह परंपरा सती और शिव के स्वयंवर की घटना से जुड़ी मानी जाती है।
कुछ जगहों पर पहले दूल्हा पहनाता है माला
भारत के कई क्षेत्रों में मातृप्रधान संस्कृति को सम्मान देने की परंपरा है। ऐसे में कुछ स्थानों पर पहले दूल्हा दुल्हन को माला पहनाता है। इसे महिलाओं के सम्मान और मातृत्व के आदर से जोड़ा गया है। ऐसा माना जाता है कि इससे समाज में स्त्री के प्रति आदर और समानता का संदेश जाता है।
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वरमाला का असली महत्व क्या है
वरमाला का असली अर्थ केवल एक रस्म निभाना नहीं बल्कि यह एक जीवनभर के समर्पण और प्रेम का वचन है। इस पल में दोनों एक-दूसरे के प्रति अहंकार छोड़कर समर्पण और सम्मान की भावना जताते हैं। यह सिर्फ फूलों की माला नहीं बल्कि दो आत्माओं के मिलन और नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक है।
इस तरह वरमाला की रस्म हिंदू विवाह का सबसे पवित्र और भावनात्मक क्षण होता है, जो प्रेम, सम्मान और जीवनभर साथ निभाने की प्रतिज्ञा का प्रतीक बन जाता है।






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