Vitamin-D Deficiency:भारत में विटामिन-डी की कमी अब सिर्फ पोषण संबंधी समस्या नहीं रह गई, बल्कि यह लाखों लोगों के लिए नई चुनौती बन रही है। ICRIER की रिपोर्ट बताती है कि हर 5 में से 1 भारतीय इस कमी से जूझ रहा है। इसकी वजह से हड्डियों की कमजोरी, फ्रैक्चर और लंबी अवधि की अपंगता का खतरा बढ़ जाता है। आइए समझते हैं कि विटामिन-डी क्यों ज़रूरी है और इसके प्राकृतिक स्रोत क्या हैं।
रिपोर्ट क्या कहती है?
भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (ICRIER) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में विटामिन B-12 और आयरन के बाद सबसे ज्यादा कमी विटामिन-डी की है। एक हिप फ्रैक्चर से मरीज को ठीक होने में साल भर लग सकता है, जिससे परिवार और स्वास्थ्य प्रणाली दोनों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। यही कारण है कि समय रहते इस कमी को पूरा करना ज़रूरी है।
हड्डियों और कैल्शियम के लिए जरूरी
डॉ. आशीष चौधरी, निदेशक – आर्थोपेडिक्स, आकाश हेल्थकेयर के अनुसार, फ्रैक्चर वाले मरीजों में अगर विटामिन-डी का स्तर कम हो तो हीलिंग धीमी हो जाती है। वहीं समय पर विटामिन-डी सप्लीमेंट लेने से रिकवरी तेज होती है। यह हड्डियों में कैल्शियम अवशोषण और नई हड्डियों के निर्माण की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है।
विटामिन-डी के प्राकृतिक स्रोत
- सुबह की धूप में रोज़ाना 15–20 मिनट बैठें।
- फैटी फिश जैसे सालमन, ट्यूना और मैकरल का सेवन करें।
- फोर्टिफाइड डेयरी प्रोडक्ट्स (दूध, दही) लें।
- गंभीर कमी की स्थिति में सप्लीमेंट लें।
डॉ. चौधरी का कहना है कि बदलती लाइफस्टाइल, प्रदूषण और इंडोर लाइफ के कारण लोग धूप से वंचित हो रहे हैं। अगर रोज़ाना थोड़ी देर धूप ली जाए तो दवा की ज़रूरत नहीं पड़ती।
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विटामिन-डी की कमी के 7 लक्षण
- हड्डियों और जोड़ों में दर्द
- दांत और मसूड़ों की कमजोरी
- बालों का झड़ना
- कमजोर इम्यूनिटी
- नींद की समस्या
- मूड स्विंग्स
- घाव का देर से भरना और शरीर में थकान





