US senators written letter to Trump: भारत-अमेरिका व्यापार रिश्तों में एक बार फिर हलचल मच गई है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए 50 फीसदी टैरिफ के बाद अब एक नया मोड़ सामने आया है। करीब तीन महीने बाद अमेरिका के दो सीनेटरों के एक खत ने भारत की खामोश लेकिन सटीक जवाबी चाल को उजागर कर दिया है। इस पूरे मामले को कई जानकार मोदी सरकार की “साइलेंट काउंटरअटैक” नीति बता रहे हैं।
अमेरिकी सीनेटरों का ट्रंप को लिखा खत
मोंटाना से सीनेटर स्टीव डाइन्स और नॉर्थ डकोटा से सीनेटर केविन क्रेमर ने ट्रंप को पत्र लिखकर भारत पर दबाव बनाने की मांग की है। इस खत में भारत द्वारा 30 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी दालों पर लगाए गए 30 फीसदी आयात शुल्क को “अनुचित” बताया गया है। यह शुल्क 1 नवंबर 2025 से लागू हुआ था, जिससे अमेरिकी किसानों को सीधा नुकसान हुआ।
भारत ने दालों पर क्यों बढ़ाया टैक्स
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उपभोक्ता है। देश में अरहर, उड़द, मसूर और मूंग जैसी दालें बड़े पैमाने पर खपत होती हैं। लेकिन कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और रूस से सस्ती दालों के आयात के चलते भारतीय किसानों को उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल पा रहा था। बाजार में दालों के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे चले गए थे। इसी वजह से भारत सरकार ने घरेलू किसानों को बचाने के लिए आयात शुल्क बढ़ाने का फैसला किया।
क्या यह ट्रंप के टैरिफ का जवाब था
सरकारी तौर पर भारत ने कभी इसे अमेरिका के खिलाफ बदले की कार्रवाई नहीं बताया। लेकिन समय को देखते हुए कई विशेषज्ञ इसे ट्रंप के 50 फीसदी टैरिफ का शांत जवाब मानते हैं। भू-राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भारत ने बिना शोर मचाए ऐसा कदम उठाया, जिससे अपने किसानों का हित भी सुरक्षित रहा और अंतरराष्ट्रीय मंच पर सीधी टकराव की स्थिति भी नहीं बनी।
अमेरिकी किसानों पर पड़ा असर
इस फैसले का सबसे ज्यादा असर अमेरिका के मोंटाना और नॉर्थ डकोटा राज्यों के दाल उत्पादकों पर पड़ा। खत में सीनेटरों ने लिखा कि भारत जैसे बड़े बाजार में ऊंचा टैक्स अमेरिकी मटर, मसूर और चने की बिक्री को नुकसान पहुंचा रहा है। उन्होंने यह भी मांग की कि किसी भी नए व्यापार समझौते से पहले अमेरिकी दालों को भारतीय बाजार में बेहतर पहुंच दी जाए।
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भारत की देसी कूटनीति का उदाहरण
यह पूरा मामला बताता है कि भारत अब व्यापार नीति में ज्यादा आत्मनिर्भर और रणनीतिक हो गया है। बिना खुली बयानबाजी के, देश ने अपने किसानों और घरेलू बाजार को प्राथमिकता दी। मोदी सरकार की यह खामोश चाल आने वाले समय में भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को किस दिशा में ले जाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल इतना तय है कि भारत अब चुपचाप, लेकिन मजबूती से अपने हित साध रहा है।






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