सागर: मध्य प्रदेश के एक गणेश मंदिर में 400 साल बाद फिर से चमत्कार देखने को मिल रहा है। ऐतिहासिक मराठा कालीन मंदिर में विराजमान भगवान गणेश की प्रतिमा का आधार एक बार फिर से बढ़ने लगा है। बीते एक दशक में प्रतिमा में अंदर भी देखने मिल रहा है। सदियों पहले भी स्वयंभू गणेश प्रतिमा बढ़ने लगी थी, तब शंकराचार्य ने प्रतिमा के सिर पर अभिमंत्रित कील लगाकर रोका था मध्य प्रदेश के सागर में ऐतिहासिक झील किनारे मराठा कालीन 400 साल से भी पुराना गणेश मंदिर है। यहां पर भगवान गणेश की सिंदूर वाली प्रतिमा 4 सदी बाद फिर से अपना आकार बढ़ा रही है। सिर में अभिमंत्रित कील होने के कारण ये उंचाई के बजाय सामने की तरफ से बढ़ रही है। प्रतिमा के माथे का आधार साल-दर-साल बढ़ रहा है। श्रद्धालु खुद अपनी आंखों से देख कर गणेशजी का चमत्कार मानकर उन्हें नमन कर रहे हैं।
देश में केवल दो अष्टकोणीय सिद्धिविनायक मंदिर
मराठा कालीन गणेशजी का अष्टकोणीय सिद्धिविनायक मंदिर करीब 1600 वीं सदी में तैयार हुआ था। उसके पहले झील में से गणेश जी की रिद्धि-सिद्धि के साथ विराजमान प्रतिमा निकली थी। इन्हें स्वयंभू माना जाता है। मंदिर अष्टकोणीय वास्तुकला और डिजाइन में बना है। मंदिर से जुड़े मराठा परिवार बताते हैं कि देश में एक महाराष्ट्र और दूसरा सागर में यह मंदिर है। अष्टकोणीय सिद्धिविनायक मंदिर देश में और कहीं नहीं है।
400 साल तक प्रतिमा का स्वरूप यथावत रहा
मंदिर में सेवा करने वाले 80 वर्षीय गोविंद राव आठले बताते हैं कि वे बचपन से प्रतिमा के दर्शन करते आ रहे हैं। प्रतिमा के सिर पर एक अभिमंत्रित कील लगी है। बुजुर्गों और मंदिर प्रबंधकों के अनुसार उस दौर में शंकराचार्य सागर आए थे, उन्होंने यह कील लगाकर प्रतिमा का आकार बढ़ने से रोका था। साल करीब 2010 के बाद से प्रतिमा के माथे का आधार और उभार अपने आप बढ़ने लगा है। यह करीब 4 इंच तक उभर आया है। जिसने एक दशक पहले दर्शन किए होंगे और अब दर्शन करेंगे तो अंतर साफ नजर आता है।
मन्नत के लिए अर्जी लगाते हैं भक्त
सागर में गणेश मंदिर के नाम से प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर में रोजाना सैकड़ों भक्त दर्शन करने आते हैं। गणेशोत्सव के दौरान लोग यहां मन्नत मांगते हैं। इसके लिए यहां पीले कपड़े में नरियल, जनेऊ, सुपारी, दक्षिणा रखकर कलावा से बांधकर गणेश जी के चरणों में रखकर अपनी मनोकामना और इच्छा बोलते हैं। गणेश जी उनकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।