पंडरीनाथ महाराज की धुनी आज भी प्रज्जवलित है
सांईखेड़ा मठ के संतों ने ली थी काशी में समाधि
खबरवाणी न्यूज, साईंखेड़ा
बावड़ी का शाब्दिक अर्थ या पुरातत्व में इसे जनता की प्यास बुझाने तथा पानी पीने के लिए उपयोग मै लिया जाता था गाओ के बुजुर्ग द्वारा बताया जाता है की गोंड राजा भील द्वारा इस बावड़ी का निर्माण किया गया था जिससे साल भर ग्रामीणों को पीने के पानी की किल्लत न हो।
मुलताई तहसील के सांईखेड़ा गांव के शिव मंदिर के बारे में पता करने पर गांव के बुजुर्ग व्यक्तियों द्वारा बताया गया कि यह मंदिर नागर शैली में 1700 ईस्वी में भील राजा द्वारा निर्मित किया गया था तथा कृतिका द्वार भी इस मंदिर में देखा जा सकता है। इस शिव मंदिर की खास बात थाना साईंखेड़ा में पुराने किले से एक गुप्त रास्ता निकलता था जो शिव मंदिर के नीचे जाकर खत्म होता था। जानकार बताते हंै कि भील राजा बकरी गाड़ी में बैठ कर गुप्त रास्ते से मन्दिर जाते थे। प्रजा मंदिर में पूजा करती थी और राजा मंदिर के नीचे पूजा अर्चना करते थे। इस शिव मंदिर की विशेष यह है कि यह नागर शैली में इस मंदिर का निर्माण हुआ है तथा इस शैली के मंदिर बैतूल जिले चार से पांच ही हैं। मान्यता यह है कि जब भी ग्राम में सूखा पड़ता है तब मंदिर के शिवलिंग को पानी से भरा जाता है और जैसे ही शिवलिंग पानी में डूबता है तो गांव में बारिश हो जाती है।
मठ मन्दिर साईंखेड़ा की है पुरात्व कहानी
मठ मंदिर साईंखेड़ा के बारे में बताया जाता है की यहां हंसगिरी महाराज, ब्रह्माण्ड गिरी महाराज और रतन गिरी महाराज दंडवत लुडक़ते हुए दो बार पंढरपुर पहुंचे थे। गांव के पुराने लोग बताते हैं कि तीसरी बार जब हंसगिरी महाराज ने पंढरपुर के लिए प्रस्थान किया तो बीच रास्ते में भगवान पंडरी नाथ महाराज ने उन्हें रास्ते में ही रोक लिया और कहा आप इतना कष्ट उठा कर न आए तभी हंसगिरी महाराज ने अपनी शर्त रखी और कहा की आप हमारे साईं खेड़ा मंदिर में निवास करिए तब पंडरीनाथ महाराज ने वादा किया कि दिन भर में एक घंटे आपके मठ मन्दिर में निवास करूंगा और सन् 1604 से अब तक साईंखेड़ा मठ मंदिर में धुनी जल रही है। मान्यता है कि जिसे संतान नहीं होती है उसे यहां मनोकामना मांगने से संतान प्राप्ति होती है, कहा जाता है कि इन सभी संतों ने काशी में समाधि ली।






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