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मां से बच्चों को दूर करना बच्चों के हित में नहीं — आमला कोर्ट
मां ही बच्चों की नैसर्गिक संरक्षक, पिता को तीन दिन में कस्टडी सौंपने के निर्देश
बैतूल।साहब, मेरी बच्ची दूध पीती है, भूखी होगी।”
पति शराब का आदी है, रोज़ाना मारपीट करता है और शराब पीने से मना करने पर उसे घर से निकाल दिया।
मायके आने के बाद पति दोनों बच्चों को भी छीन ले गया।
ये गुहार एक मां की है।जिसने अपने कलेजे के टुकड़ों को पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाकर पति से उन बच्चों को दिलाने की अपील की जो उससे छुड़ा ले गया था।
जिस पर आमला न्यायालय कोर्ट ने एक कस्टडी के मामले में महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी करते हुए कहा है कि मां से बच्चों को दूर रखना न तो उचित है और न ही बच्चों के हित में। न्यायालय ने माना कि मां ही बच्चों की नैसर्गिक संरक्षक है।
मामला एक महिला का है जिसने अपनी डेढ़ वर्ष की दूधमुंही पुत्री और तीन वर्ष के पुत्र की अभिरक्षा के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। महिला ने बताया कि उसका पति शराब का आदी है और आए दिन उसके साथ मारपीट करता है। शराब पीने से मना करने पर उसे घर से निकाल दिया गया। मायके आने के बाद पति ने पहले तीन साल के बेटे को और फिर आठ दिन पहले डेढ़ साल की बेटी को मायके से जबरन ले गया।
महिला ने अपने अधिवक्ता शिवम उपाध्याय के माध्यम से घरेलू हिंसा एवं महिला संरक्षण अधिनियम के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी आमला के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर दोनों बच्चों की अंतरिम कस्टडी मांगी थी।
पति को नोटिस भेजा गया था, लेकिन वह न्यायालय में उपस्थित नहीं हुआ। अधिवक्ता उपाध्याय ने तर्क दिया कि अधिनियम की धारा 21 के तहत न्यायालय अंतरिम आदेश पारित कर कस्टडी मां को दे सकता है।
दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने कहा कि बच्ची की आयु डेढ़ वर्ष है और वह मां पर आश्रित है। ऐसी स्थिति में मां से बच्ची को दूर रखना न तो मां के लिए उचित है, न ही बच्ची के स्वास्थ्य के लिए।
न्यायालय ने आदेश दिया कि पति तीन दिवस के भीतर दोनों बच्चों की कस्टडी मां को सौंपे। साथ ही, परियोजना अधिकारी आमला को निर्देशित किया गया कि वे आदेश की जानकारी पति को दें और तय समय सीमा में आदेश का पालन सुनिश्चित करें।





