
इस विधानसभा से जो जीतता उसकी बनती प्रदेश में सरकार
Political News – बैतूल – विधानसभा नजदीक आ रहे हैं और संभवत: नवम्बर के अंतिम सप्ताह तक मध्यप्रदेश में चुनाव पूर्ण हो चुके होंगे और दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में नई सरकार शपथ ले चुकी होगी। वैसे यह मान्यता लंबे समय से चली आ रही है कि बैतूल विधानसभा से जिस दल का उम्मीदवार चुनाव जीतता है प्रदेश में उसी की सरकार बनती है। और चुनाव के आंकड़े यह भी बताते हैं कि लगातार किसी भी दल का कोई प्रत्याशी बैतूल विधानसभा से चुनाव नहीं जीता है।
अब लोगों को यह इंतजार है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में क्या यह मिथक टूटता है या भाजपा और कांग्रेस के 2018 के उम्मीदवारों में किसी की टिकट बदलेगी।
दीपचंद गोठी ही लगातार जीते थे तीन चुनाव | Political News

बैतूल विधानसभा में एक अपवाद को छोडक़र 1952 से यह मिथक कायम है। बैतूल विधानसभा का पहला चुनाव 1952 में मध्य प्रांत (सीपी प्राविंस) जिसकी राजधानी नागपुर थी। इसमें दीपचंद गोठी कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीते थे और उस समय प्रदेश में सरकार भी कांग्रेस की बनी थी।
1956 में मध्यप्रदेश का गठन हुआ और 1957 में मध्यप्रदेश के पहले चुनाव में दीपचंद गोठी ही पुन: कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीते और प्रदेश में सरकार भी कांग्रेस की बनी।1962 में भी कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में तीसरी बार विधायक बने और प्रदेश में सरकार भी कांगे्रस की ही बनी। लेकिन 1962 के चुनाव के बाद बैतूल विधानसभा से किसी भी दल का कोई प्रत्याशी लगातार दूसरा चुनाव नहीं जीता।
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1967 और 2018 में दोनों बार गिरी कांग्रेस सरकार

1967 के विधानसभा चुनाव में जनसंघ से अपने समय के जुझारू नेता रहे जीडी खण्डेलवाल विधानसभा चुनाव जीते और सरकार तो कुछ दिनों के लिए कांग्रेस की रही लेकिन कांग्रेस विधायकों के विद्रोह के बाद सरकार पलट गई और संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी जिसमें जीडी खण्डेलवाल मंत्री बने।
इसी तरह की स्थिति 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद हुई। जहां कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में निलय डागा चुनाव जीते लेकिन 15 महीने में ही कांग्रेस विधायकों के विद्रोह के बाद कांग्रेस की सरकार गिर गई और भाजपा की सरकार बन गई।
1977 में पहली बार जीता था निर्दलीय | Political News

1972 में कांग्रेस के डॉ. मारोतीराव पांसे विधायक बने और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी जो पूरे पांच साल चली। इसके बाद 1977 तक आते-आते तक कांग्रेस की स्थिति खराब हो गई और नए चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जनसंघ (जनता पार्टी में विलय) से विद्रोह कर चुनाव लड़े माधवगोपाल नासेरी चुनाव जीते और प्रदेश में सरकार भी जनता पार्टी की बनी।
1980 में टूटा था बैतूल विधानसभा का मिथक
1980 में जनता पार्टी से पुन: जनसंघ समूह टूटा और भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ। 1980 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने जनसंघ की विचारधारा के माधवगोपाल नासेरी को चुनाव मैदान में उतारा और चुनाव जीते लेकिन बैतूल विधानसभा का यह मिथक पहली बार और 2018 के बीच पहली बार टूटा कि जिस दल का प्रत्याशी जीतता है प्रदेश में उसी की सरकार बनती है। 1980 के चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी थी।
1985 से दोनों मिथक है कायम | Political News

1985 के चुनाव से बैतूल विधानसभा से जुड़े ये दोनों मिथक अभी तक कायम है कि किसी भी दल का कोई प्रत्याशी लगातार दुबारा चुनाव नहीं जीतता है और जिस दल का प्रत्याशी चुनाव जीतता है उसी दल की प्रदेश में सरकार बनती है। 1985 में नए उम्मीदवार के रूप में डॉ. अशोक साबले को चुनाव मैदान में उतारा और उन्होंने जीत दर्ज करी और प्रदेश में सरकार भी कांग्रेस की बनी।
लेकिन 1990 आते-आते प्रदेश की स्थिति बदल गई और 1990 में भाजपा के भगवत पटेल ने डॉ. अशोक साबले को चुनाव हरा दिया और प्रदेश में सरकार भी भाजपा की बनी। 1993 से पुन: कांग्रेस के डॉक्टर अशोक साबले चुनाव जीते और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी। 1998 में कांग्रेस के विनोद डागा चुनाव जीते और प्रदेश में सरकार फिर कांग्रेस की बनी। लेकिन अशोक साबले लगातार दो बार विधायक नहीं रहे।
2003 में भाजपा के शिवप्रसाद राठौर चुनाव जीते और सरकार भी भाजपा की बनी। 2008 में भाजपा के अलकेश आर्य, 2013 में भाजपा के हेमंत खण्डेलवाल चुनाव जीते और दोनों बार भाजपा की सरकार बनी। 2018 में कांग्रेस के निलय डागा ने भाजपा के हेमंत खण्डेलवाल को हराकर चुनाव जीता और सरकार कांग्रेस की बनी। इस तरह से लगातार दो बार हेमंत खण्डेलवाल भी विधायक नहीं बन पाए।
2018 के खिलाड़ी पुन: आएंगे मैदान में!

खबरवाणी को कांग्रेस और भाजपा के सूत्रों से जो पुख्ता जानकारी प्राप्त हुई है उसके अनुसार भाजपा से पुन: हेमंत खण्डेलवाल और कांग्रेस से निलय डागा चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। राजनैतिक हलकों में यह चर्चा है कि क्या बैतूल विधानसभा से जुड़े मिथक कायम रहेंगे या इनमें कोई बदलाव होगा।
यदि निलय डागा दुबारा चुनाव जीतते हैं तो यह मिथक टूटेगा और यदि निलय डागा के विधायक बनने के साथ प्रदेश में भाजपा की सरकार बनती है तो दूसरा मिथक भी टूट जाएगा। वहीं यदि हेमंत खण्डेलवाल चुनाव जीतते हैं और सरकार भाजपा की बनती है तो दोनों मिथक कायम रहेंगे।





