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संसदीय रक्षा समिति के सदस्यों को अयोध्या ले जाने का प्रस्ताव, सियासी हलचल तेज

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संसद की स्थायी रक्षा समिति से जुड़ी एक अहम खबर सामने आई है। समिति के सदस्यों को अयोध्या ले जाने का प्रस्ताव रखा गया है, जिसे लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। खास बात यह है कि इस समिति में कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी सदस्य हैं, ऐसे में यह प्रस्ताव सियासी नजरिए से काफी अहम माना जा रहा है।

17 से 22 जनवरी तक चार शहरों का आधिकारिक दौरा

रक्षा मंत्रालय से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति 17 जनवरी से 22 जनवरी 2026 के बीच देश के चार बड़े शहरों का दौरा करेगी। इस दौरान समिति कोच्चि, बेंगलुरु, भुवनेश्वर और वाराणसी जाएगी। इस दौरे का मकसद रक्षा मंत्रालय और उससे जुड़े रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों (Defence PSUs) के कामकाज की समीक्षा करना है। समिति अलग-अलग संस्थानों और परियोजनाओं की जमीनी हकीकत को समझेगी।

वाराणसी के बाद अयोध्या जाने का सुझाव

सूत्रों के मुताबिक, 22 जनवरी को वाराणसी में दौरा खत्म होने के बाद 23 जनवरी को समिति के सदस्यों को अयोध्या में रामलला मंदिर दर्शन के लिए ले जाने का प्रस्ताव रखा गया है। हालांकि, इस प्रस्ताव पर अभी तक विपक्षी दलों के सदस्यों की औपचारिक सहमति नहीं मिली है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष इस पर क्या रुख अपनाता है।

कुछ सदस्य पूरे दौरे से रह सकते हैं अनुपस्थित

इस बीच एक और जानकारी सामने आई है कि समिति के कुछ सदस्यों ने पूरे दौरे से अनुपस्थित रहने की अनुमति मांगी है। इन सदस्यों ने अपने-अपने राज्यों में चल रही SIR (स्पेशल इलेक्टोरल या प्रशासनिक प्रक्रिया) से जुड़ी जिम्मेदारियों का हवाला दिया है। समिति अध्यक्ष से इस बारे में औपचारिक अनुमति मांगी गई है।

अध्यक्ष राधामोहन सिंह, राहुल गांधी की मौजूदगी बनी चर्चा का विषय

इस संसदीय समिति के अध्यक्ष भाजपा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह हैं। वहीं, राहुल गांधी की समिति में मौजूदगी की वजह से अयोध्या दौरे का प्रस्ताव राजनीतिक तौर पर और भी संवेदनशील माना जा रहा है। राम मंदिर दर्शन से जुड़ा कोई भी फैसला स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बयान के तौर पर देखा जाएगा, यही वजह है कि विपक्ष की सहमति को लेकर स्थिति साफ नहीं है।

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राजनीतिक और प्रतीकात्मक दोनों मायनों में अहम दौरा

कुल मिलाकर, रक्षा समिति का यह दौरा सिर्फ प्रशासनिक समीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़ा अयोध्या का प्रस्ताव इसे राजनीतिक और प्रतीकात्मक दोनों ही नजरियों से खास बना देता है। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि विपक्ष इस प्रस्ताव को स्वीकार करता है या नहीं, और क्या समिति के सभी सदस्य अयोध्या दर्शन का हिस्सा बनते हैं।

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