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क्या भारत ने राष्ट्रपति ट्रंप का साथ दिया? रूस से तेल खरीद में रिकॉर्ड गिरावट, वित्तीय रिपोर्ट ने खोले राज

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अमेरिका और भारत के रिश्तों में बीते कुछ महीनों से तेल और टैरिफ को लेकर खटास देखने को मिल रही है। अब एक नई वित्तीय रिपोर्ट ने इस बहस को और तेज कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद में बड़ी कटौती की है, जबकि अमेरिका से तेल आयात में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में आकर यह कदम उठाया है।

भारत और अमेरिका के बीच तेल को लेकर तनातनी

पिछले कई महीनों से अमेरिका भारत पर दबाव बना रहा था कि वह रूस से सस्ता तेल खरीदना बंद करे। राष्ट्रपति ट्रंप कई बार सार्वजनिक मंचों से भारत और यूरोपीय देशों को चेतावनी दे चुके हैं। अमेरिका का मानना रहा है कि रूस से तेल खरीदने से उसे आर्थिक मजबूती मिलती है। इसी बीच अब जो वित्तीय रिपोर्ट सामने आई है, उसने सबका ध्यान खींच लिया है।

अमेरिका से तेल आयात में जबरदस्त उछाल

वित्त वर्ष 2025 के पहले 8 महीनों के आंकड़ों के अनुसार भारत ने अमेरिका से तेल आयात में करीब 92 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। नवंबर 2024 में जहां भारत ने अमेरिका से सिर्फ 1.1 मिलियन टन तेल खरीदा था, वहीं नवंबर 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 2.8 मिलियन टन पहुंच गया। यानी मात्रा के हिसाब से 144 प्रतिशत का उछाल देखने को मिला है, जो अपने आप में बड़ा संकेत माना जा रहा है।

रूस से तेल खरीद में क्यों आई गिरावट

रूस से तेल आयात की बात करें तो अक्टूबर 2025 में भारत ने मूल्य के हिसाब से 38 प्रतिशत और मात्रा के हिसाब से 31 प्रतिशत की कटौती की। यह अब तक की सबसे तेज गिरावट मानी जा रही है। हालांकि इसकी वजह सिर्फ राजनीतिक दबाव नहीं बताई जा रही। विशेषज्ञों का कहना है कि रूस पर लगाए गए नए अमेरिकी प्रतिबंध और वैश्विक सप्लाई में कमी भी इसके पीछे बड़ी वजह हैं।

आंकड़े बताते हैं पूरी कहानी

दिलचस्प बात यह है कि नवंबर 2025 में भारत ने रूस से 7.7 मिलियन टन तेल आयात किया, जो पिछले साल नवंबर 2024 के मुकाबले करीब 6.8 प्रतिशत ज्यादा है। यानी कुल मात्रा में रूस अभी भी भारत का बड़ा सप्लायर बना हुआ है। फर्क बस इतना है कि अमेरिका से आयात की रफ्तार कहीं ज्यादा तेज रही है, जिससे प्रतिशत के आंकड़े चौंकाने वाले नजर आ रहे हैं।

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क्या वाकई ट्रंप को मिली राहत

नवंबर 2025 में रूस की बड़ी तेल कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल पर अमेरिकी प्रतिबंध लगे, जिसके बाद दिसंबर से रूस के तेल निर्यात में गिरावट दर्ज की गई। ट्रंप इस गिरावट से खुश नजर आ रहे हैं, लेकिन असली तस्वीर तब सामने आएगी जब दिसंबर के आधिकारिक सरकारी आंकड़े जारी होंगे। फिलहाल इतना तय है कि भारत अपने फायदे को देखकर संतुलन साधने की नीति पर चल रहा है, न कि किसी एक देश के दबाव में।

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