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तनाव के बीच भारत-पाकिस्तान का बड़ा कदम, न्यूक्लियर ठिकानों की सूची का हुआ आदान-प्रदान

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भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में लंबे समय से तल्खी बनी हुई है। सीमा पर तनाव, कूटनीतिक बयानबाज़ी और राजनीतिक खींचतान के बावजूद दोनों देश हर साल एक अहम परंपरा निभाते आ रहे हैं। इसी कड़ी में गुरुवार को भारत और पाकिस्तान ने अपने-अपने परमाणु प्रतिष्ठानों (न्यूक्लियर इंस्टॉलेशंस) की सूची एक-दूसरे के साथ साझा की, जिसे सुरक्षा के लिहाज़ से बड़ा कदम माना जा रहा है।

कूटनीतिक चैनलों से हुआ सूची का आदान-प्रदान

विदेश मंत्रालय के मुताबिक, नई दिल्ली और इस्लामाबाद में एक साथ कूटनीतिक माध्यमों से यह सूचियां एक्सचेंज की गईं। यह प्रक्रिया पूरी तरह तय नियमों और अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत की गई। खास बात यह है कि मौजूदा हालात चाहे जैसे भी हों, दोनों देश इस परंपरा को नहीं तोड़ते, जो भरोसे की एक छोटी लेकिन अहम डोर को बनाए रखती है।

35वीं बार निभाई गई यह परंपरा

भारत के विदेश मंत्रालय ने बताया कि यह भारत-पाकिस्तान के बीच 35वीं बार न्यूक्लियर ठिकानों की सूची का आदान-प्रदान है। पहली बार यह सूची 1 जनवरी 1992 को साझा की गई थी। तब से लेकर अब तक, हर साल बिना किसी रुकावट के यह प्रक्रिया जारी है। यह दिखाता है कि परमाणु सुरक्षा के मुद्दे पर दोनों देश गंभीर हैं।

क्या है भारत-पाकिस्तान न्यूक्लियर समझौता

दरअसल, भारत और पाकिस्तान के बीच यह अहम समझौता 31 दिसंबर 1988 को साइन किया गया था, जो 27 जनवरी 1991 से लागू हुआ। इस समझौते का मकसद है कि कोई भी देश दूसरे के परमाणु प्रतिष्ठानों या सुविधाओं पर हमला न करे। इसके तहत दोनों देशों को हर साल 1 जनवरी को अपनी न्यूक्लियर फैसिलिटीज की जानकारी साझा करनी होती है।

क्यों जरूरी है न्यूक्लियर ठिकानों की जानकारी साझा करना

न्यूक्लियर ठिकानों की सूची का आदान-प्रदान विश्वास निर्माण उपाय (Confidence Building Measure) माना जाता है। इससे यह साफ संदेश जाता है कि दोनों देश परमाणु सुरक्षा को लेकर लापरवाही नहीं बरतेंगे। साथ ही, किसी भी गलतफहमी या दुर्घटना की आशंका कम होती है, जो पूरे क्षेत्र की शांति के लिए बेहद जरूरी है।

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तनाव के बावजूद शांति की छोटी कोशिश

भले ही भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में कड़वाहट बनी रहे, लेकिन न्यूक्लियर समझौते का पालन करना यह दिखाता है कि कुछ मुद्दे राजनीति से ऊपर होते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे कदम भविष्य में संवाद और स्थिरता की जमीन तैयार कर सकते हैं। यह कदम भले छोटा लगे, लेकिन दक्षिण एशिया की सुरक्षा के लिहाज़ से इसका महत्व काफी बड़ा है।

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