देश के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर एक बार फिर सियासी और संवैधानिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। केंद्र सरकार इस बात पर गंभीरता से विचार कर रही है कि क्या राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ की तरह वंदे मातरम् के लिए भी कोई औपचारिक नियम और प्रोटोकॉल तय किया जाए। इसी सिलसिले में गृह मंत्रालय (MHA) ने हाल ही में अधिकारियों के साथ एक अहम बैठक भी की है।
वंदे मातरम् को लेकर सरकार क्या सोच रही है?
सूत्रों के मुताबिक, गृह मंत्रालय की बैठक में यह चर्चा हुई कि राष्ट्रीय गीत को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश होने चाहिए या नहीं। अभी तक वंदे मातरम् के सम्मान को लेकर कोई सख्त नियम तय नहीं हैं, जबकि जन गण मन के लिए खड़े होना, सावधान मुद्रा में रहना और सम्मान दिखाना अनिवार्य है।
बैठक में यह भी देखा गया कि क्या वंदे मातरम् को भी उसी श्रेणी में लाया जाए या फिर अलग पहचान बरकरार रखी जाए।
नए नियमों में क्या-क्या हो सकता है शामिल?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, संभावित नियमों में ये बातें शामिल हो सकती हैं:
- किन मौकों पर वंदे मातरम् गाया जाए
- क्या इसे राष्ट्रीय गान के साथ अनिवार्य किया जाए
- गीत के समय खड़े होने या सावधान रहने का नियम
- अपमान की स्थिति में सजा या जुर्माने का प्रावधान
हालांकि अभी यह सब विचार के स्तर पर है, कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।
संविधान में वंदे मातरम् की क्या है स्थिति?
‘वंदे मातरम्’ को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था और आज़ादी की लड़ाई में यह गीत क्रांति का नारा बना। संविधान सभा ने साफ कहा था कि वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गान के बराबर सम्मान मिलेगा, लेकिन कानूनी रूप से इसे राष्ट्रीय गान का दर्जा नहीं दिया गया।
संविधान के अनुच्छेद 51A(a) में नागरिकों का कर्तव्य बताया गया है कि वे राष्ट्रीय गान का सम्मान करें, लेकिन राष्ट्रीय गीत को लेकर ऐसा कोई स्पष्ट दंडात्मक कानून मौजूद नहीं है।
संसद में क्यों गरमाया था यह मुद्दा?
हाल ही में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान इस मुद्दे पर जमकर बहस हुई। गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने तुष्टिकरण की राजनीति के चलते वंदे मातरम् की गरिमा को कम किया।
बीजेपी का दावा है कि 1937 में कांग्रेस ने गीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश हटवा दिए थे, जबकि कांग्रेस इस आरोप को सिरे से नकारती रही है।
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आगे क्या हो सकता है फैसला?
फिलहाल सरकार सभी पहलुओं पर सोच-विचार कर रही है। अगर नया प्रोटोकॉल लागू होता है, तो यह राष्ट्रीय भावना, सम्मान और संवैधानिक संतुलन के लिहाज से एक बड़ा फैसला होगा।





