घटस्थापना में जौ बोने की परंपरा क्यों है खास?
Navratri के दौरान घटस्थापना का बड़ा महत्व माना जाता है। इस दिन मिट्टी के बर्तन में जौ बोए जाते हैं, जिसे हमारे देसी अंदाज़ में “जवारे उगाना” भी कहते हैं। मान्यता है कि ये जौ माता रानी का आशीर्वाद लेकर आते हैं। पुराने जमाने से लोग इसे सिर्फ रिवाज नहीं बल्कि भविष्य के संकेत मानते आए हैं। घर में सुख-शांति और तरक्की के लिए ये परंपरा निभाई जाती है।
जौ को क्यों माना जाता है ‘पूर्ण अन्न’?
हिंदू मान्यताओं के अनुसार जौ को सबसे पहला उगने वाला अन्न कहा जाता है। इसलिए इसे “पूर्ण धान्य” का दर्जा मिला है। जब घट के साथ जौ बोए जाते हैं, तो इसका मतलब होता है कि हम माता अन्नपूर्णा से घर में कभी अन्न और पानी की कमी न होने की दुआ मांग रहे हैं। देसी भाषा में कहें तो “घर हमेशा भरा-पूरा रहे” यही भावना होती है।
सप्तधान्य का देसी मतलब क्या है?
घटस्थापना में सिर्फ जौ ही नहीं, बल्कि सात तरह के अनाज (सप्तधान्य) का इस्तेमाल भी किया जाता है। इसमें चावल, तिल, मूंग, चना, गेहूं आदि शामिल होते हैं। ये धरती की उर्वरता और जीवन की बुनियादी जरूरतों का प्रतीक हैं। बीच में रखा कलश पानी का संकेत देता है और आसपास उगते जौ अनाज का — मतलब जिंदगी में कभी कमी ना आए।
जौ के रंग से क्या संकेत मिलते हैं?
अब बात आती है सबसे दिलचस्प चीज की — जौ का रंग क्या बताता है:
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हरा-भरा जौ: अगर जौ अच्छे से हरे-भरे उगें तो समझो साल बढ़िया जाएगा, पैसा और शांति दोनों आएंगे।
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ऊपर हरा, नीचे सफेद: इसका मतलब शुरुआत अच्छी और अंत में बड़ा फायदा।
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पीला या काला पड़ना: ये थोड़ा अशुभ माना जाता है, यानी सेहत या परेशानी आ सकती है। ऐसे में माता रानी से माफी और पूजा करना सही माना जाता है।
टेढ़े या धीमे उगने वाले जौ का मतलब
अगर जौ धीरे-धीरे उगें या टेढ़े-मेढ़े निकलें तो देसी मान्यता कहती है कि इस साल मेहनत ज्यादा करनी पड़ेगी। काम में रुकावट या मन का तनाव भी हो सकता है। इसलिए लोग अष्टमी या नवमी के दिन इन जवारों की पूजा करके नदी में विसर्जन करते हैं, ताकि नकारात्मकता दूर हो जाए।
कुल मिलाकर, ये परंपरा सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि हमारी देसी समझ और प्रकृति से जुड़ी एक खूबसूरत आस्था है, जो हमें आने वाले समय के संकेत भी देती है।
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