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गांव में बंदरों का आतंक, लोग दहशत में

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खबरवाणी

गांव में बंदरों का आतंक, लोग दहशत में

जिम्मेदारी को लेकर पंचायत और वन विभाग आमने-सामने, समाधान अब भी अधूरा

भौंरा। नगर में इन दिनों ‘बंदरराज’ कायम हो गया है। हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि सुबह के समय लोग घर से निकलने तक से डर रहे हैं। बीते एक साल से लगातार बढ़ रहे बंदरों के आतंक ने अब विकराल रूप ले लिया है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि पंचायत और वन विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हुए मूकदर्शक बने हुए हैं। नतीजा आम जनता रोजाना जान जोखिम में डालकर जीने को मजबूर है। सबसे खतरनाक स्थिति सुबह 5 बजे से 10 बजे के बीच देखने को मिल रही है, जब बंदरों के झुंड सड़कों, गलियों और छतों पर कब्जा जमाकर लोगों पर हमला कर रहे हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे, टहलने निकले बुजुर्ग और दुकान खोलने वाले व्यापारी इनके सबसे आसान निशाने बन रहे हैं।
करीब डेढ़ माह पहले पप्पू जोगी पर हुए हमले ने इस खतरे की गंभीरता को उजागर कर दिया था। रेलवे स्टेशन से सीमेंट रोड होते हुए लौट रहे जोगी और उनके साथियों पर अचानक बंदरों के झुंड ने हमला बोल दिया। जान बचाने के लिए उन्हें पीछे भागना पड़ा। जिस रास्ते पर यह घटना हुई, उसी रास्ते से रोजाना छोटे-छोटे बच्चे ट्यूशन के लिए गुजरते हैं,जो अब हर दिन डर के साए में चलने को मजबूर हैं।
एक माह पहले माता मोहल्ला में तो हद ही हो गई, जब 7 वर्षीय मासूम अमन शेख पर बंदर ने हमला कर दिया। घर के बाहर खेल रहे बच्चे को बंदर ने पकड़कर खींच लिया और उसकी पीठ पर पंजे गड़ा दिए। बच्चे की चीख-पुकार सुनकर परिजन बाहर दौड़े और डंडों से किसी तरह उसे बचाया। गंभीर रूप से घायल बच्चे को तत्काल शाहपुर अस्पताल ले जाना पड़ा, जहां उसे एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाए गए।
चार दिन पहले रेलवे कॉलोनी में जो हुआ, उसने पूरे मामले को और भयावह बना दिया। 55 वर्षीय शिक्षक अनुनाथ मानकर पर सुबह टहलते समय एक नहीं, बल्कि दो बंदरों ने क्रमशः हमला किया। जान बचाने की कोशिश में वे रेलवे पटरी पर गिर पड़े और घायल हो गए। गनीमत रही कि उस समय ट्रेन नहीं आई,वरना यह घटना सीधे जानलेवा हादसे में बदल सकती थी।
व्यापार भी इस आतंक से अछूता नहीं है। बस स्टैंड के किराना व्यापारी अजय मिश्रा बताते हैं कि सुबह दुकान खोलना तक मुश्किल हो गया है। बंदर खुलेआम दुकान पर धावा बोलते हैं, स्नैक्स और चॉकलेट के डिब्बे तक उठाकर ले जाते हैं। जब तक हम कुछ समझें, वे छत पर चढ़ जाते हैं। रोज नुकसान हो रहा है,

हजारों बंदरों ने बनाया नगर को ‘खुला आतंक क्षेत्र’

नगर के माता मोहल्ला, रेलवे कॉलोनी, रामलीला चौक,सीमेंट रोड, आजाद वार्ड सहित हर मोहल्ले में बंदरों के झुंड सक्रिय हैं। घरों की छतों से कपड़े उठाना, रसोई तक में घुसना और राह चलते लोगों पर हमला करना अब आम बात हो चुकी है। महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा भयभीत हैं। स्थिति यह है कि कई परिवारों ने सुबह बच्चों को अकेले बाहर भेजना बंद कर दिया है।

शिकायतों का अंबार, जिम्मेदारी से भाग रहे अधिकारी

स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस गंभीर समस्या को लेकर पंचायत और वन विभाग को सैकड़ों बार शिकायतें दी जा चुकी हैं, लेकिन हर बार जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल दी जाती है। वन विभाग इसे पंचायत का काम बताता है, जबकि पंचायत वन विभाग की ओर इशारा कर पल्ला झाड़ लेती है। इस आपसी टकराव में आम नागरिक पिस रहा है और खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।

किसी बड़ी घटना का इंतजार?

लगातार हो रहे हमलों और बढ़ते खतरे के बावजूद प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही जिम्मेदार विभाग जागेंगे?

पंचायत का पक्ष:

भौंरा सरपंच मीरा धुर्वे ने कहा कि नगर में बढ़ते बंदर आतंक को लेकर पंचायत गंभीर है। हम वन विभाग को पत्र लिखकर बंदरों को पकड़वाने के लिए आवश्यक कार्रवाई का अनुरोध करेंगे, ताकि आम नागरिकों को राहत मिल सके।

वन विभाग का पक्ष:

भौंरा वन परिक्षेत्र अधिकारी वीरेंद्र तिवारी ने स्पष्ट किया कि लाल मुंह वाले बंदर वन्यजीव संरक्षण के दायरे में नहीं आते हैं, इसलिए उन्हें पकड़ने के लिए विभाग के पास कोई निर्धारित प्रावधान नहीं है। ऐसी स्थिति में पंचायत स्तर पर ही इन्हें पकड़ने की कार्रवाई की जा सकती है। वन विभाग आवश्यक सहयोग देने के लिए तैयार है।

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