Lung Cancer: अक्सर लोगों को लगता है कि फेफड़ों का कैंसर सिर्फ सिगरेट या बीड़ी पीने वालों को ही होता है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं अलग है। आज के समय में ऐसे हजारों मामले सामने आ रहे हैं, जहां व्यक्ति ने कभी धूम्रपान नहीं किया, फिर भी वह लंग कैंसर का शिकार हो गया। इसका कारण हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में छुपे वे खतरे हैं, जिन पर हम ध्यान ही नहीं देते।
घर के अंदर छुपे खतरनाक कारण
कई बार खतरा बाहर नहीं बल्कि हमारे अपने घर के अंदर ही होता है। दूसरे लोगों के सिगरेट के धुएं में सांस लेना, जिसे पैसिव स्मोकिंग कहा जाता है, फेफड़ों को धीरे धीरे नुकसान पहुंचाता है। इसके अलावा घरों में पाई जाने वाली रेडॉन गैस भी बहुत खतरनाक मानी जाती है। यह गैस जमीन की दरारों, फर्श, दीवारों और बेसमेंट के जरिए घर के अंदर जमा हो जाती है, खासकर उन घरों में जहां हवा का आवागमन कम होता है।
बाहर की हवा भी बन सकती है जानलेवा
शहरों में बढ़ता प्रदूषण, गाड़ियों का धुआं, फैक्ट्रियों से निकलने वाली जहरीली गैसें और सड़क की धूल फेफड़ों को कमजोर बना देती हैं। जंगलों में आग या लकड़ी जलाने से उठने वाला धुआं भी लंबे समय तक सांस के जरिए शरीर में जाता है। लगातार ऐसी हवा में रहने से फेफड़ों की कोशिकाएं खराब होने लगती हैं, जिससे कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
केमिकल्स और पारिवारिक इतिहास का असर
पुराने मकानों की मरम्मत, सीमेंट और पेंट का काम, या कुछ खास उद्योगों में काम करने वाले लोग अक्सर एस्बेस्टस, आर्सेनिक और क्रोमियम जैसे जहरीले तत्वों के संपर्क में आ जाते हैं। कई बार दूषित पानी के जरिए भी ये रसायन शरीर में पहुंच जाते हैं। अगर परिवार में किसी को कम उम्र में फेफड़ों का कैंसर हुआ हो, तो अगली पीढ़ी में इसका खतरा और ज्यादा बढ़ जाता है।
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इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें
फेफड़ों का कैंसर धीरे धीरे बढ़ता है, इसलिए शुरुआती लक्षण हल्के होते हैं। लंबे समय तक खांसी रहना, सांस लेने में दिक्कत, सीने में दर्द या भारीपन, आवाज बैठना, खांसी में खून आना और अचानक वजन कम होना इसके संकेत हो सकते हैं। समय रहते जांच कराने से जान बचाई जा सकती है। इसके लिए जरूरी है कि धुएं से दूर रहें, घर की सही वेंटिलेशन रखें, प्रदूषण से बचाव करें और किसी भी लक्षण पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।





