खबरवाणी
चरनोई छीनी तो आजीविका संकट में
भातना,छिमरी के ग्रामीण एकजुट, ग्रामसभा की सहमति बिना निर्णय पर उठाए सवाल
भौंरा। शाहपुर तहसील अंतर्गत ग्राम भातना और छिमरी की दखल रहित चरनोई एवं निस्तार भूमि को आरक्षित वन घोषित करने के प्रस्ताव के खिलाफ दोनों गांवों की ग्रामसभा ने एकजुट होकर अनुविभागीय अधिकारी कार्यालय शाहपुर पहुंचकर तहसीलदार को संयुक्त ज्ञापन सौंपा। ग्रामीणों का कहना है कि ग्रामसभा की सहमति के बिना उनकी सामुदायिक भूमि पर निर्णय लेने की प्रक्रिया चल रही है, जिससे पशुपालन, कृषि और पारंपरिक निस्तार व्यवस्था पर सीधा संकट खड़ा हो गया है। संयुक्त ज्ञापन में बताया गया है कि ग्राम भातना की कुल 8.498 हेक्टेयर दखल रहित भूमि खसरा नंबर 52, 66, 81 और 82 तथा ग्राम छिमरी की 43.059 हेक्टेयर भूमि खसरा नंबर 01 वर्षों से ग्रामसभा के अधीन चरनोई और निस्तार प्रयोजन के लिए उपयोग में है। ग्रामीणों का कहना है कि इन भूमियों को आरक्षित वन घोषित किए जाने पर पशुचारण पर प्रतिबंध लग जाएगा, जिससे खेती-किसानी और ग्रामीण आजीविका प्रभावित होगी।
ग्रामीणों ने राजस्व अभिलेखों का हवाला देते हुए बताया कि ग्राम भातना के खसरा नंबर 52 की भूमि सामुदायिक भवन के लिए, खसरा नंबर 81 मृत पशुओं के निस्तारण चीर-फाड़ हेतु तथा खसरा नंबर 82 गोठान एवं पारंपरिक पशु उपयोग के लिए आरक्षित है। वहीं ग्राम छिमरी का खसरा नंबर 01 म.प्र. राजस्व भू-संहिता 1959 की धारा 237 के अंतर्गत दखल रहित चरनोई भूमि के रूप में दर्ज है। ग्रामीणों का कहना है कि इन भूमियों का स्वरूप बदलना नियमों और परंपरा दोनों के विपरीत है।
ग्रामीण गमरसा ककोडिया ने कहा, हमारी खेती पशुओं पर निर्भर है और पशु इसी चरनोई पर पलते हैं। अगर यह जमीन वन घोषित हो गई तो गांव की पूरी व्यवस्था चरमरा जाएगी।
छिमरी निवासी सलभत उइके ने कहा, यह फैसला ग्रामसभा से पूछे बिना लिया जा रहा है। हमारी निस्तार भूमि पर रोक लगी तो पशुपालन असंभव हो जाएगा।
आदिवासी नेता हेमंत सरयाम ने संयुक्त आपत्ति का समर्थन करते हुए कहा कि चरनोई और निस्तार भूमि पर ग्रामसभा का अधिकार सर्वोपरि है। उन्होंने कहा, ग्रामसभा की सहमति के बिना ऐसे निर्णय पेसा नियमों की भावना के खिलाफ हैं और इससे सामाजिक असंतोष बढ़ता है।
ग्रामीणों ने अपने ज्ञापन में 28 जनवरी 2011 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक उपयोग और निस्तार भूमि को संरक्षित रखना ग्रामसभा हित में आवश्यक बताया गया है। साथ ही, उन्होंने मध्यप्रदेश शासन द्वारा 22 नवंबर 2022 को लागू पंचायत उपबंध अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार नियम, 2022 का हवाला देते हुए कहा कि ग्रामसभा को अपने क्षेत्र के भीतर स्थित भूमि, जल और वन जैसे प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन का अधिकार प्राप्त है।
संयुक्त ज्ञापन में दोनों गांवों के ग्रामीणों ने मांग की है कि दखल रहित राजस्व भूमि को आरक्षित वन घोषित करने संबंधी प्रस्ताव को निरस्त किया जाए और भातना तथा छिमरी की संबंधित भूमियों को पूर्ववत चरनोई एवं निस्तार प्रयोजन के लिए सुरक्षित रखा जाए। ग्रामीणों ने स्पष्ट किया है कि यदि उनकी आपत्तियों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित रूप से आंदोलनात्मक कदम उठाने को विवश होंगे।
इस संबंध में तहसीलदार टी. विश्क ने बताया कि ग्राम भातना और छिमरी के ग्रामीणों का संयुक्त ज्ञापन प्राप्त हो गया है। प्रस्तुत दस्तावेजों एवं राजस्व अभिलेखों के आधार पर मामले की जांच कराई जाएगी और संबंधित विभागों से रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद नियमानुसार निर्णय लिया जाएगा।





