विक्रम संवत क्या है और क्यों खास है
विक्रम संवत भारत की प्राचीन और बेहद वैज्ञानिक पंचांग प्रणाली है, जो आज भी हमारी संस्कृति में गहराई से जुड़ी हुई है। यह ग्रेगोरियन कैलेंडर से लगभग 57 साल आगे चलता है। यानी साल 2026 में विक्रम संवत 2083 शुरू होगा। खास बात ये है कि हमारे ज्यादातर हिंदू त्योहार इसी पंचांग के अनुसार मनाए जाते हैं। यह सिर्फ तारीख गिनने का तरीका नहीं, बल्कि हमारी परंपरा, ज्योतिष और जीवनशैली का अहम हिस्सा है।
राजा विक्रमादित्य से जुड़ा इतिहास
मान्यता है कि उज्जैन के महान राजा विक्रमादित्य ने 57 ईसा पूर्व इस संवत की शुरुआत की थी, शकों पर विजय के बाद। तभी से यह कैलेंडर भारत के कई हिस्सों में अपनाया गया। आज भी गांव-देहात से लेकर बड़े शहरों तक, लोग इसे शुभ मानते हैं और इसके अनुसार ही पूजा-पाठ और त्योहार मनाते हैं।
चांद-सूरज का अनोखा खेल (लूनी-सोलर सिस्टम)
विक्रम संवत की सबसे खास बात ये है कि ये चंद्रमा और सूर्य दोनों की चाल पर आधारित है। इसके महीने अमावस्या और पूर्णिमा के हिसाब से तय होते हैं। हर 3 साल में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे ‘अधिकमास’ या ‘पुरुषोत्तम मास’ कहते हैं। इससे मौसम और त्योहारों का तालमेल बना रहता है—यानी होली सर्दी में और दिवाली ठंड के मौसम में ही आएगी, इधर-उधर नहीं।
हिंदू नववर्ष कैसे मनाया जाता है
विक्रम संवत का नया साल ‘चैत्र शुक्ल प्रतिपदा’ से शुरू होता है, जो 2026 में 19 मार्च को पड़ेगा। इस दिन से चैत्र नवरात्रि भी शुरू हो जाती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग नाम से मनाया जाता है—महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, दक्षिण में उगादी और उत्तर भारत में नवसंवत्सर। लोग घर सजाते हैं, आम के पत्तों का तोरण लगाते हैं, नए कपड़े पहनते हैं और मंदिर जाकर पूजा करते हैं।
ज्योतिष और व्यापार में महत्व
इस दिन पंचांग श्रवण की परंपरा होती है, जहां पंडित जी पूरे साल का भविष्य बताते हैं—जैसे बारिश कैसी होगी, खेती कैसी रहेगी, व्यापार कैसा चलेगा। मान्यता के अनुसार, जिस दिन नववर्ष शुरू होता है, उस दिन का ग्रह ‘राजा’ होता है। इस साल गुरु को राजा और मंगल को मंत्री माना गया है। वहीं व्यापारी लोग दिवाली पर नया बही-खाता शुरू करते हैं और शेयर बाजार में ‘मुहूर्त ट्रेडिंग’ भी होती है।
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