Guru Wisdom Teachings: भारतीय संस्कृति में गुरु को भगवान से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। कहा गया है “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु” क्योंकि गुरु ही जीवन की दिशा तय करता है। लेकिन अगर गुरु ही गलत निकल जाए, तो इंसान सही रास्ते से भटक सकता है। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के विदुर नीति के माध्यम से सच्चे और झूठे गुरु की पहचान बहुत साफ शब्दों में बताई है। आइए जानते हैं, सच्चा गुरु कैसा होता है और किनसे सावधान रहना चाहिए।
सच्चे गुरु का असली अर्थ क्या है
सच्चा गुरु वह नहीं जो सिर्फ ज्ञान की बातें करे, बल्कि वह होता है जो शिष्य के विचार, चरित्र और विवेक को मजबूत करे। वेदव्यास के अनुसार माता-पिता पहले गुरु होते हैं, फिर शिक्षक और उसके बाद जीवन के अनुभव। जो खुद अज्ञान में डूबा हो, वह किसी और को प्रकाश नहीं दे सकता। सच्चा गुरु शिष्य को सच से परिचित कराता है, न कि भ्रम में डालता है।
विदुर नीति में गलत गुरु को लेकर चेतावनी
विदुर नीति साफ कहती है कि अगर गुरु में ज्ञान, अनुभव और आचरण की कमी हो, तो ऐसे गुरु को त्याग देना ही बुद्धिमानी है। अयोग्य गुरु से शिक्षा लेने पर न सिर्फ समय और धन बर्बाद होता है, बल्कि सोच भी गलत दिशा में चली जाती है। ऐसा गुरु शिष्य को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय उसे मानसिक रूप से कमजोर कर देता है।
सच्चे गुरु की पहली पहचान
सच्चा गुरु ज्ञान और आचरण—दोनों में शुद्ध होता है। वह शिष्य से अंधविश्वास नहीं, सवाल करने की समझ पैदा करता है। ऐसा गुरु खुद को सबसे बड़ा नहीं मानता, बल्कि जीवनभर सीखता रहता है। उसका उद्देश्य शिष्य को अपने पैरों पर खड़ा करना होता है, न कि अपने पीछे चलने वाला बनाना।
सच्चे गुरु की दूसरी पहचान
जो गुरु सही और गलत का फर्क साफ-साफ समझाए, वही असली मार्गदर्शक होता है। वह कठिन समय में भी कड़वा सच बोलने से नहीं डरता। सच्चा गुरु डर, लालच या चमत्कार दिखाकर शिष्य को बांधता नहीं है। वह विवेक और तर्क के रास्ते पर चलना सिखाता है।
ऐसे गुरुओं से रहें सावधान
जो गुरु सिर्फ धन, प्रसिद्धि या चमत्कार का लालच दे, उससे दूरी बनाना ही ठीक है। जो खुद अनुशासनहीन हो या शिष्य को भ्रम में डाले, वह गुरु कहलाने के लायक नहीं। गलत गुरु जीवन की दिशा बदल सकता है, जबकि सही गुरु जीवन को ऊँचाइयों तक ले जाता है।





