Search ई-पेपर ई-पेपर WhatsApp

शिवपुरी में पारिवारिक कलह बना त्रासदी, मां ने बच्चों संग दी जान

By
On:

शिवपुरी: जिंदगी की जद्दोजहद, रिश्तों की उलझन और मन की टीस कभी-कभी इंसान को ऐसी राह पर ले जाती है, जहां से लौटना नामुमकिन हो जाता है. शिवपुरी जिले के बैराड़ थाना क्षेत्र के जौराई गांव में गुरुवार की सुबह एक ऐसी ही दिल दहला देने वाली घटना सामने आई, जिसने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया. एक मां ने अपने मासूम बेटे और बेटी के साथ आत्महत्या कर ली.

घटनास्थल पर छाया मातम, पसरा सन्नाटा

गांव की फिजा गुरुवार की सुबह अचानक चीख-पुकार और सन्नाटे में बदल गई, जब तड़के करीब 3:30 बजे मृतका की सास ने कुएं में तीनों के शव देख लिए. मां पिंकी (पत्नी रामनिवास बघेल), उसकी नन्ही सी 4 साल की बेटी रुचिका और सिर्फ 8 माह के बेटे आनंद की लाशें एक साथ कुएं में मिलीं. उस पल मां की ममता, बच्चों की मासूम मुस्कान और परिवार की खुशियां सब कुछ हमेशा के लिए कुएं की गहराई में डूब गई.

चीख-पुकार सुनकर गांव के लोग दौड़े. वहीं, परिजन बदहवास हो गए. सूचना मिलते ही बैराड़ तहसीलदार दृगपाल सिंह वैस और थाना प्रभारी रवि शंकर कौशल पुलिस टीम के साथ पहुंचे. तीनों शवों को कुएं से बाहर निकाला गया. मातम का आलम ऐसा था कि हर आंख नम थी, हर चेहरा सवालों से भरा हुआ. आखिर ऐसा क्या हो गया कि एक मां को अपने 2 मासूमों के साथ खौफनाक कदम उठाना पड़ा.

अधूरी कहानी, टूटे सपने और छूटती सांसें

बताया जाता है कि घटना के वक्त पिंकी का पति रामनिवास बघेल गिरिराज जी की परिक्रमा से लौटने के बाद अपनी ससुराल शिवपुरी में रुका हुआ था. घर पर सिर्फ सास और बाकी परिवार के सदस्य थे. हालांकि, पुलिस को अभी तक कोई आत्महत्या नोट या ठोस वजह नहीं मिली है लेकिन प्राथमिक तौर पर यह मामला पारिवारिक कलह का बताया जा रहा है. पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है. मृतका के परिजनों के बयान लिए जा रहे हैं ताकि आत्महत्या की असली वजह सामने आ सके.

गांव में पसरा मातम, आंखों में बसी है मासूमों की तस्वीर

गांव में हर किसी की आंखें नम हैं. लोग पिंकी और उसके मासूम बच्चों की यादों में डूबे हैं. उनकी छोटी-छोटी शरारतें, मासूम हंसी और ममतामयी मां की गोद अब बस यादों का हिस्सा बनकर रह गई है. परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है, जिसने सब कुछ छीन लिया.

 

 

इस घटना ने एक बार फिर समाज के सामने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आज भी हम पारिवारिक समस्याओं और मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों को समय रहते सहारा दे पा रहे हैं? या फिर हर घर के कुएं में कोई न कोई दर्द आज भी गहराई में दबा हुआ है? यह खबर सिर्फ तीन मौतों की नहीं, बल्कि टूटते सपनों, अधूरी उम्मीदों और समाज की अनसुनी पीड़ा की दास्तान है, जो सभी को सोचने के लिए मजबूर कर देती है.

For Feedback - feedback@example.com
Home Icon Home E-Paper Icon E-Paper Facebook Icon Facebook Google News Icon Google News