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एर्दोआन सरकार का बड़ा कदम, तुर्की में 63 फौजी अफसरों पर कार्रवाई

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तुर्की: राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोआन ने देश की सुरक्षा में लगे अपने ही सैनिकों पर बड़ा वार किया है. सरकार का दावा है कि सेना के भीतर गहरी साजिश पकड़ी गई है और अब उसी के तहत 63 अफसरों पर कार्रवाई शुरू की गई है जिनमें चार कर्नल भी शामिल हैं. इस्तांबुल के मुख्य लोक अभियोजक कार्यालय ने इन सभी के खिलाफ FETO से रिश्तों के आरोप में गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं. सुबह-सवेरे हुई छापेमारी में 56 अफसरों को हिरासत में लिया जा चुका है. ये सभी तुर्की की सेना, नौसेना, वायुसेना और अर्धसैनिक बल जेंडरमेरी से जुड़े हुए थे. सरकार का दावा है कि ये सभी वही लोग हैं, जिनके तार 2016 में हुई नाकाम तख्तापलट की कोशिश से जुड़े हैं.

फिर चर्चा में फेतुल्लाह गुलेन
जिस संगठन से इन अफसरों के जुड़ाव की बात की जा रही है, वह है फेतुल्लाह गुलेन का नेटवर्क FETO. फेतुल्लाह गुलेन एक इस्लामी धर्मगुरु रहे हैं, जो पिछले दो दशकों से अमेरिका में स्वनिर्वासन में थे. तुर्की सरकार का आरोप रहा है कि गुलेन ने ही 2016 में तख्तापलट की साजिश रची थी. हालांकि गुलेन ने इन आरोपों को हमेशा नकारा है. अक्टूबर 2024 में अमेरिका में उनकी मौत हो चुकी है, लेकिन तुर्की में उनका नाम अब भी अस्थिरता का प्रतीक बना हुआ है.

2016: जब एर्दोआन बाल-बाल बचे
15 जुलाई 2016 की रात तुर्की की राजनीति में हमेशा के लिए दर्ज हो गई. सेना के एक धड़े ने अंकारा और इस्तांबुल में बगावत कर दी. संसद और राष्ट्रपति भवन पर लड़ाकू विमानों से हमला हुआ. उस वक्त राष्ट्रपति एर्दोआन छुट्टी पर थे और एक रिसॉर्ट से वीडियो कॉल कर के लोगों से सड़कों पर उतरने की अपील की थी. इस बगावत में करीब 290 लोगों की जान चली गई, लेकिन अंत में तख्तापलट नाकाम रहा.

2016 के बड़ी तादाद में गिरफ्तारियां
उस तख्तापलट के बाद तुर्की में बड़े स्तर पर सफाई अभियान चला. फौज, पुलिस, अदालतों और सरकारी दफ्तरों से हजारों लोगों को निकाला गया. अब तक 25,801 सैनिकों को हिरासत में लिया जा चुका है. कई स्कूल, बिजनेस और मीडिया संस्थान जो गुलेन से जुड़े थे, बंद कर दिए गए. अभियोजकों का कहना है कि FETO आज भी तुर्की के संविधान और राज्य की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है. गिरफ्तारियों में शामिल लोगों की पहचान उनके फोन रिकॉर्ड्स के जरिए की गई.

एर्दोगान और गुलेन की पुरानी जान-पहचान
दिलचस्प बात ये है कि कभी गुलेन ने एर्दोगान को सत्ता में लाने में मदद की थी. लेकिन जब एर्दोगान ने गुलेन के स्कूलों पर लगाम लगाई और गुलेन समर्थकों ने सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, तो दोनों के रास्ते जुदा हो गए. इसके बाद से ही तुर्की सरकार गुलेन को दुश्मन मान बैठी.

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